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Thursday, April 28, 2011

थैक्यू मिस्टर डेनिस लिली


वन डे क्रिकेट में 18 हजार से ज्यादा रन, टेस्ट में लगभग 15 हजार रन, टेस्ट व वन डे में कुल जमा 99 शतक, क्रिकेट वर्ल्ड कप का खिताब और भी दर्ज़नों रिकार्ड सचिन तेंडुलकर के नाम नहीं होते यदि आस्ट्रेलिया के तेज गेंदबाज डेनिस लिली नहीं होते। सचिन क्रिकेट की दुनिया में आज जो मुकाम हासिल किया है, उसमे उनकी प्रतिभा, मेहनत, समर्पण के साथ डेनिस लिली की नेक सलाह का भी अहम योगदान है। लिली ही थे जिन्होंने सचिन को गेंद के बजाए बल्ला थामने की सलाह दी थी। लिली राह नहीं दिखाते तो मराठी कवि का यह बेटा शायद मुंबई के लाखों क्रिकेटरों की तरह गुमनामी में खोकर रह जाता।

सचिन की उम्र महज 13 साल थी तब उनकी आंखों में तेज गेंदबाज बनने का ख्वाब पल रहा था। दुनिया के तेज गेंदबाजों में अपने बल्लेबाजी से खौफ़ पैदा करने वाले सचिन खुद तेज गेंदबाज बनकर बल्लेबाजों को दहलाना चाहते थे। भला हो डेनिस लिली का जिन्होने सचिन को गेंदबाज की बजाए बल्लेबाज बनने की सीख दी। लिली की यह सलाह 22 साल से पूरी दुनिया के गेंदबाजों के लिए सिरदर्द साबित हो रही है। इतना ही नहीं लिली के देश के सर्वकालिक महान स्पिनर शेन वार्न को तो सचिन सपनों में भी डराते थे।

पांच फुट पांच इंच का सचिन क्रिकेट के मैदान पर नित नए उंचाई छू रहा है, लेकिन इस हीरे को उनके गुरू रमाकांत आचरेकर के अलावा किसी जौहरी ने परखा तो वह डेनिस लिली ही थे। सचिन के लिए भी लिली की सलाह को नजरअंदाज करना आसान नहीं था। लिली सचिन के लिए क्या मायने रखते है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब 15 साल की उम्र में सचिन ने पहली बार उनकी गेंद का सामना किया था। सचिन इतने उत्साहित थे कि उन्होंने सीधे अपने भाई अजीत से फोन पर बात की और उन्हें बताया था कि लिली ने मेरे खिलाफ गेंद फेंकी।

डेनिस लिली यदि सचिन तेंडुलकर को रिजेक्ट नहीं करते तो केवल भारत ही नहीं दुनिया का क्रिकेट इतिहास शायद ही इतना गौरवशाली होता। क्रिकेट को भले ही धर्म माना जाता लेकिन क्रिकेट प्रेमियों को इबादत के लिए भगवान शायद ही मिलता। क्रिकेट प्रेमियों को 22 साल से भगवान को दुनिया के अलग अलग मैदानों में चमत्कार देखने को मिल रहे तो इसके लिए उन्हें डेनिस लिली का शुक्रगुजार होना चाहिए।

अंत में डेनिस लिली के शब्दों में ही जान लेते है कि सचिन की बल्लेबाजी के मायने उनके लिए क्या है
यदि मैं सचिन को गेंदबाजी करता तो मैं जरूर हेलमेट लगाकर गेंदबाजी करता क्योंकि वह गेंद पर जबर्दस्त प्रहार करते हैं।

Wednesday, April 27, 2011

यादगार लम्हा


एक अरब 21 करोड़ लोगों की दुआ रंग लाई। 28 साल बाद क्रिकेट की दुनिया में भारत का परचम फिर लहराया। मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंडुलकर का अधूरा ख्वाब हकीकत में बदल रहा था। जीवन के सबसे गौरवशाली क्षणों में क्रिकेट का भगवान भी भावुक हो उठा। 22 साल के लंबे कैरियर में जो नहीं हुआ वह देखने को मिला। सचिन का चेहरा आंसूओं से भींगा हुआ था।

सचिन अच्छे अच्छे गेंदबाजों को रूला देते है लेकिन दो अप्रैल की रात को वानखेड़े स्टेडियम पर मास्टर ब्लास्टर की आंखे छलक रही थी। क्रिकेट के मैदान पर बरसों से अपने इमोशन को कन्ट्रोल करने वाले सचिन वर्ल्ड कप की जीत के इस लम्हे को जीकर इतने भावुक हो गए कि आंखों से आंसू रोक नहीं सकें।

टीम इंडिया के खिलाड़ियों के चेहरे आंसूओं से भरे हुए थे। इन दृश्यों के अलावा वर्ल्ड कप जीत के बाद सचिन को अपने कंधों पर उठाए स्टेडियम का चक्कर लगा रहे उनसे आधी उम्र के विराट कोहली की तस्वीर भी सामने आ जाती है तो साथ ही याद आता विराट का उम्मीदों से बढ़कर दिया गया बयान जिसमें सचिन को कंधे पर बैठाकर स्टेडियम का चक्कर लगाने पर वह कहते है ' 21 साल तक देश की उम्मीदों का बोझ उठाया है और आज हमारी बारी थी उन्हें कंधे पर उठाकर सम्मान देने की।'

वर्ल्ड कप जीत का खुमार इतना था कि एक दृश्य जो लोगों के जेहन में बस नहीं पाया। यह वह क्षण था जब मैच के बाद सचिन तेंडुलकर इंटरव्यू दे रहे थे। इस दौरान सचिन फिर भावुक हो उठे थे। ऐसे में इंटरव्यू लेने वाले संजय मांजरेकर पर किसी की नजर नहीं पड़ी।


यह वही संजय मांजरेकर थे जो कुछ सालों पहले सचिन पर अपने कड़वे बोलों से लिपटे बयानों की बाउंसर फेंक रहे थे। कभी सचिन को असफलताओं से डरने वाला बताया तो आए दिन घायल होने और उनकी फिटनेस पर सवाल खड़े किए। आस्ट्रेलिया के खिलाफ जब भारत 351 रनों के भारी भरकम लक्ष्य से तीन रन दूर रह गया था तब भी मांजरेकर सचिन पर बरस पड़े थे। सचिन 175 रनों की पारी खेलने के बाद आउट हुए थे। इतने नजदीक पहुंचने के बाद मुकाबला नहीं जीतने पर सचिन को अफसोस रहा लेकिन मांजरेकर को उस समय भी कटाक्ष करने का मौका मिल गया था। मांजरेकर ने कहा कि मुझे पता था कि सचिन आखिरकार टीम को निराश कर जाएंगे जैसा उन्होंने पहले भी किया है। पहले भी कई ऐसे मौके रहे हैं, जब सचिन टीम को जीत की दहलीज पर पहुंचाकर खुद ही फिसल गए और अब एक बार फिर उन्होंने ऐसा ही किया।

सचिन तेंडुलकर अमूमन संजय मांजरेकर की आलोचनाओं का जवाब देने से बचते रहे। केवल मांजरेकर नहीं बल्कि किसी भी आलोचना का जवाब अपने बल्ले से देने वाले सचिन ने वर्ल्ड कप में भी कुछ ऐसा ही करिश्मा किया था। एक दौर में लगातार हो रही आलोचना के बाद सचिन ने जवाब दिया था कि उन पर जो पत्थर फेके जाते है वह उन्हे माइल स्टोन में बदलने में भरोसा रखते है। वर्ल्ड कप जीतने के बाद सचिन एक बार फिर उस बात को सार्थक करते नजर आए। संजय इन बातों को समझ न पाए क्योंकि वह माइल स्टोन बनाने में नहीं बल्कि शायद पत्थर फेंकने में ज्यादा भरोसा करते है।

Tuesday, April 26, 2011

सचिन तेंदुलकर, राहुल गांधी और कांग्रेस

सचिन तेंडुलकर, कांग्रेस और राहुल गांधी। किसी भी नजरिए से देखा जाए तो तीनों में किसी तरह का कोई सामंजस्य नजर नहीं आता। सचिन क्रिकेट के मैदान पर नित नए कीर्तिमान रच रहे है। कांग्रेस अब भी देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है और राहुल गांधी इस पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव है। क्रिकेट से राहुल का रिश्ता बस इतना है कि वह कभी कभार दर्शक के रूप में क्रिकेट के मैदान पर नजर आ जाते है। इन तीनों में आपसी गठजोड़ जानने के लिए 22 साल पीछे जाने की जरूरत है।

1989 यह वही साल था जब सचिन ने इंटरनेशनल क्रिकेट में चहलकदमी थी। क्रिकेट में सचिन के हिमालयीन सफर का आगाज और कांग्रेस के शिखर से नीचे फिसलने का सफर लगभग साथ ही शुरू हुआ। सचिन महज 16 साल की उम्र में जब पाकिस्तानी गेंदबाजों का कचूमर निकाल रहे थे तो लोकसभा चुनाव में मतदाता कांग्रेस के एक के बाद एक विकेट गिरा रहे थे। आजादी के बाद यह दूसरा मौका था जब कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई।

सचिन के क्रिकेट की दुनिया में एकछत्र राज की मजबूत नींव 22 साल पहले पड़ी थी। कांग्रेस के एकछत्र राज की समाप्ति का दौर भी इसी के साथ शुरू हो गया था। समय के साथ साथ सचिन अकेले ही भारतीय टीम के तारणहार बन गए तो कांग्रेस को एकला चलो की नीति को बाजू में रखकर विरोधी दलों से हाथ मिलाने पड़े।

1989 में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने मतदान की आयु सीमा 21 साल से घटाकर 18 साल की थी। सचिन उस वक्त पाकिस्तान की ज़मी पर मुल्क का झंडा बुलंद कर रहे थे। इसके बावजूद उन्हें अपने मुल्क में अपना नुमाइंदा चुनने का अधिकार नहीं था। सचिन की उम्र भले ही 16 साल थी लेकिन यह वही चुनाव था जिसमें राहुल गांधी ने पहली बार अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया होगा।

1989 के बाद सचिन ने पीछे मूड़कर नहीं देखा। वहीं राहुल गांधी को मतदान का अधिकार मिलने के बाद हुए हर चुनाव में कांग्रेस को सहयोगी दलों की ओर देखना पड़ा। कांग्रेस जैसे जैसे कमजोर होती गई सचिन इंटरनेशनल क्रिकेट में उतनी ही दमदारी से अपनी जगह मजबूत करते गए। देश में एकछत्र राज करने वाली पार्टी राज्यों में सिमट कर रह गई। गठबंधन के समझौते करने पड़े तो मजबूत गढ़ एक एक कर विरोधी दलों के कब्जे में जाते रहे। सचिन एक अरब से ज्यादा भारतवासियों की उम्मीदों का बोझ अपने कांधों पर लादे रहे तो कांग्रेस को देश का नेतृत्व करने के लिए गठबंधन की बैसाखियों का सहारा लेना पड़ा।

1989 से शुरू हुआ यह सिलसिला अब भी जारी है। ज्यादा समय नहीं बीता जब भुराड़ी में कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था। कांग्रेस गांधी परिवार में अपना भविष्य ढूंढ रही थी। सबकी निगाहें राहुल गांधी पर टिकी हुई थी। अधिवेशन में पहले सारा मजमा सोनिया गांधी और दिग्विजय सिंह ने लूट लिया। राहुल गांधी की बारी आने के पहले ही सचिन ने दक्षिण अफ्रीका में सेंचुरियन के मैदान पर शतक जमाकर शतकों का अर्धशतक पूरा कर लिया। भुराड़ी में राहुल गांधी की बजाए सचिन की जय जयकार होने लगी। राहुल गांधी को पीछे छोड़ कांग्रेसी नेताओं में सचिन तेंडुलकर को भारत रत्न दिए जाने की पैरवी करने की होड़ मच गई।

अभी पांच राज्यों में चुनाव हो रहे है। कांग्रेस का जनाधार दरकता जा रहा है। वह अधिकांश राज्यों में गठबंधन के सहारे चुनावी समर में उतर रही है। वही सचिन की मौजूदगी में टीम इंडिया ने दुनिया जीत ली है। 28 साल बाद क्रिकेट की दुनिया में भारत का परचम लहरा रहा है। कांग्रेसी नेताओं के दामन पर भ्रष्टाचार के दाग नजर आ रहे है तो बेदाग सचिन केवल क्रिकेटरों के लिए नहीं बल्कि करोड़ों भारतवासियों के लिए रोल मॉडल बने हुए है।

Monday, April 25, 2011

सचिन की रूहानी मोहब्बत


क्रिकेट एक जुनून है और सचिन उस जुनून का दूसरा नाम ... लेकिन बात यहीं नहीं ठहरती .. सचिन क्रिकेट के जुनूनी प्लेयर से शायद आगे बढ़कर हैं ... क्रिकेट उनकी मोहब्बत है ... सचिन और क्रिकेट की मोहब्बत देख उमराव जान का वह संवाद याद आ जाता है जिसमें कोठे में बैठा एक बुजुर्ग उमराव जान से कहता है 'या तो किसी की हो जाओ या किसी को अपना बना लो।' सचिन तेंडुलकर और क्रिकेट की मोहब्बत का फलसफा भी कुछ ऐसा ही है। सचिन तेंडुलकर क्रिकेट के हो गए।

सत्य साईं बाबा के निधन के बाद बेहद दुखी थे। कयास लगाए जा रहे थे कि सचिन डेक्कन चार्जर्स के खिलाफ मैच में न खेलें लेकिन सचिन का क्रिकेट के प्रति प्यार समर्पण औऱ जुनून ही था जो उन्हें मुकाबले तक खींच लाया। सचिन चाहते तो न खेलने का फैसला कर सकते थे। लेकिन क्रिकेट का भगवान अपने कर्तव्य पथ से कभी अलग नहीं हो सकता। भारी मन से ही सही लेकिन सचिन मैदान में उतरे और अपनी टीम को जीत दिलाई। 

सचिन का ये जुनून, खेल के लिए उनका समर्पण पहले भी देखा गया है। सचिन के पिताजी का 1999 के वर्ल्ड कप के दौरान निधन हो गया। सचिन वर्ल्ड कप के बीच में ही घर आए और पिताजी का अंतिम संस्कार के बाद तुरंत लौट गए। यही नहीं उन्होंने कीनिया के खिलाफ शानदार शतक ठोका औऱ आकाश में भरी नजरों से देखा शायद अपने दिवंगत पिता को यही कहा होगा कि आप देखिए आपका बेटा अपने कर्तव्य पथ पर अडिग है।

सचिन जानते हैं कि उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं।  इसका मतलब ये नहीं कि वो भावुक नहीं। जिन्हें लगता है कि सचिन भावुक नहीं और केवल जुनूनी व्यक्ति हैं उन्हें याद करना होगा कीनिया के खिलाफ मैच शतक मारने के बाद क्रिकेट के इस दीवाने की आंखे भी नम हो गई थी। मानो वो शतक उन्होंने अपने पिता को याद करते हुए ही बनाया था। इस बार भी आध्यात्मिक आराध्य सत्य साईं बाबा के निधन के बाद सचिन जब उन्हें श्रृद्धाजलि देने पहुंचे तो आंखों में आंसू उमड़ पड़े। आखिर सचिन भी एक इंसान हैं और इंसान अपनी भावनाओं के आगे हमेशा विवश हो जाता है। सचिन की भावुक भावनाएं भी छलक उठी।

इंसान होने के नाते सचिन भावुक हैं तो क्रिकेटर होने के तौर पर प्रोफेशनल प्लेयर हैं।  क्रिकेट प्रति उनकी यह जीवटता, समर्पण और कभी न हार मारने का जज्बा ही उन्हें दुनिया के बाकी क्रिकेटरों की जमात में काफी आगे रखता है। इतना आगे कि कोई उन तक पहुंच भी नहीं पाता है। सचिन और क्रिकेट एक दूजे के होकर रह गए है। क्रिकेट को धर्म माना जाता है तो सचिन को यूं ही भगवान का दर्जा नहीं दिया गया है। सचिन ने भी जीवन के अहम मौकों पर बता दिया कि दुनिया भले ही उन्हें भगवान कहती हो लेकिन क्रिकेट उनके लिए भी एक धर्म ही है।

क्रिकेट से मोहब्बत और जीवटता के मामले में सचिन के करीब कोई नजर आता है तो वह दिल्ली के विराट कोहली है। साल 2006 में कर्नाटक के खिलाफ रणजी ट्राफी मुकाबले में दिल्ली की टीम मुसीबत में थी। दिल्ली की सारी उम्मीदें विराट कोहली पर टिकी हुई थी जो दिन का खेल खत्म होने पर 40 रनों पर नाबाद थे। विराट अगले दिन बल्लेबाजी शुरू कर पाते इसके पहले ही उनके पिता के निधन की खबर आ जाती है। पिता को अंतिम विदाई देने के पहले विराट फिरोजशाह कोटला पर 90 रनों की पारी खेल अपनी टीम के लिए तारणहार बनते है। किसी भी खेल के लिए जो जूनुन चाहिए वह सचिन या विराट में नजर आता है जो किसी आम इंसान के बस का नहीं है।

खेल हो या मोहब्बत। दुनिया उसी को सलाम करती है जिन्होंने खुद को इसके लिए समर्पित कर दिया।। हीर-रांझा, लैला-मजनूं, शीरी-फरहाद, रोमियो-जूलियट जैसे प्रेमियों को दुनिया आज भी याद करती है। सचिन और क्रिकेट की मोहब्बत भी बस कुछ ऐसी ही है।

Friday, December 24, 2010

मैं गोपीचंद हूं

मैं गोपीचंद हूं। खेलमंत्री एम एस गिल से मुलाकात करते वक्‍त पुलैला गोपीचंद को कुछ इसी तरह अपना परिचय देना पड़ा था। यह वाकया दो साल पुराना है जब गोपीचंद अपनी शिष्‍या और स्‍टार शटलर साइना नेहवाल के साथ खेल मंत्री एम एस गिल से मुलाकात करने पहुंचे थे। खेलमंत्री के सामने पहचान संकट होने के बावजूद गोपीचंद पर इसका जरा सा भी असर नहीं दिखा था। दो साल बाद अब एम एस गिल का बतौर खेलमंत्री कार्यकाल सवालों के घेरे में है तो वहीं साइना दुनिया की नंबर वन खिलाड़ी बनने की दहलीज पर खड़ी है। चीन की दीवार जिसमें साइना ने पहले सेंध लगाई थी अब धराशायी हो चुकी है। इन सबके बीच नहीं बदला तो गोपीचंद का अंदाज। वह अब भी चिरपरिचित मुस्‍कान लिए शांत, सहज और सरल है। चीन की दीवार को लांघती अपनी शिष्‍या की सफलता में वह किसी शोरशराबे के बगैर परछाई की तरह हर पल मौजूद है।

साइना की सफलता के पीछे गोपीचंद के समर्पण को देख मोहम्‍मद अली का कथन याद आता है कि कोई विजेता उस समय विजेता नहीं बनते जब वे किसी प्रतियोगिता को जीतते हैं। विजेता तो वे उन घंटों, सप्‍ताहों, महीनों और वर्षों में बनते हैं जब वे इसकी तैयारी कर रहे होते हैं। साइना को आज दुनिया विजेता के रूप में देख रही है, इसके पीछे खुद साइना की मेहनत के साथ साथ गोपीचंद का समर्पण और बरसों की मेहनत छुपी हुई है। साइना की सफलता गोपीचंद के बगैर अधूरी है।


पुलैला गोपीचंद साइना की सफलताओं की अनकही गाथा है। हर हाल में संघर्ष, आखिर तक हार न मानने और जीत की एक अटूट जिद कुछ ऐसे पैगाम है जिनके चलते साइना सहित भारतीय बैडमिंटन आज सफलता के नए मुकाम पर है। ये बात अलहदा है कि एक खिलाड़ी की जीत में उसके हुनर और दमखम का खासा जोर रहता है लेकिन इसके अलावा उसे हर हाल में जीतने और हारी बाजी को जीत में बदलने के कुछ ऐसे गुरुमंत्र होते हैं जो एक कोच ही सीखा सकता है। गोपीचंद ने अपने , पके बच्चों को यही सिखाया है। सही मायनों में गोपीचंद एक कुशल शिल्पी हैं जिनकी कलाकृति साइना सहित भारतीय बैडमिंटन में झलकती है।

गोपीचंद के उदय के पहले भारतीय बैडमिंटन का जिक्र प्रकाश पादुकोण से शुरू होकर उन्‍हीं पर खत्‍म हो जाता था। प्रकाश पादुकोण ने भारतीय बैडमिंटन को पहचान दी तो पुलैला ने इस खेल में भारत के अटूट संघर्ष की कहानी लिखी है। प्रकाश पादुकोण और गोपीचंद के ऑल इंग्‍लैंड बैडमिंटन चैंपियनशिप जीतने में अंतर शायद ये रहा कि जहां प्रकाश पादुकोण की कहानी उनसे शुरु होकर वहीं तक सिमट कर रह गई वहीं गोपींचद ने इस जीत को निरंतरता में डालने की आदत डाली।


पुलैला ने न केवल अपनी सफलता को खुद तक सीमित रखा बल्कि उसे एक मिसाल के तौर पर आने वाली पीढियों के सामने रखा और शायद यही कारण है कि आज बैडमिंटन में भारत का एक नाम है। अफसोस की बात ये है कि भारत के खेल संघ यहां तक कि खेल मंत्री भी उनकी सफलताओं से गौरवान्वित नहीं होते, क्योंकि अगर होते तो शायद पुलैला को यूं अपना परिचय देने की जरूरत न होती। ये वाकया दो साल पुराना है इस घटना के बाद आज भारतीय बैडमिंटन एक नए मुकाम पर है। साइना नेहवाल एंड कंपनी दुनिया में अपनी सफलताओं का परचम लहरा रही हैं तो उनके साथी डबल्स और मिक्सड डबल्स में धमाका किए हुए हैं। इन बातों से इतर गोपीचंद अपना काम जारी रखे हैं।

खुशी की बात है कि भारत सरकार ने अपने इस स्टार खिलाड़ी की सफलता के महत्व को पहचाना और उसे सम्मानों से नवाजा है। गोपीचंद एकमात्र ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्हें अर्जुन अवार्ड, द्रोणाचार्य अवार्ड, राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार मिला है। सम्मानों की लंबी फेहरिस्त के बीच पुलैला ने अपने व्यकितगत आदर्शों को बनाए रखा। मिडिल क्‍लास से संबंध रखने वाले पुलैला ने कोला जैसी कंपनी का विज्ञापन ठुकरा दिया क्योंकि ये पेय उनके मापदंडों पर खरा नहीं उतरता। उन्‍हें ऐतराज था कि जिस शीतल पेय का वह सेवन नहीं करते उसका प्रचार प्रसार वो कैसे कर सकते हैं। इतना ही नहीं हैदराबाद में अपनी एकेडमी के लिए जब धन की कमी आड़े आई तो उन्‍होंने अपना घर गिरवी रखने से भी परहेज नहीं किया। विपरीत परिस्थितियों में सफलता हासिल करने वाले गोपीचंद को फाइटर प्लेयर और एक आदर्श कोच के तौर पर सलाम।

Thursday, November 25, 2010

रेहान का मिस्‍टर डिपेंडेबल


फना फिल्‍म में आमिर खान और उनके बेटे रेहान के बीच एक बेह‍द छोटा लेकिन बेहद रोचक संवाद है। यह संवाद राहुल द्रविड को लेकर है। आतंकी बने आमिर अपने बेटे रेहान से बड़े ही मासूमियत भरे अंदाज में कहते है कि वह राहुल द्रविड की तरह क्रिकेट नहीं खेल सकते है। आमिर कहते है डिपेंडेबल नहीं है और राहुल द्रविड की तरह उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। फिल्‍म में पिता पुत्र के बीच यह कुछ पलों का संवाद था। रेहान को अपने राहुल द्रविड़ पर भरोसा है। द्रविड ने रील लाइफ के रेहान और रियल लाइफ के करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों की नजर में इस भरोसे को एक बार फिर कायम रखा है। राहुल द्रविड ने नागपुर में जता दिया कि क्‍यो उन्‍हें मिस्टर डिपेंडेबल कहां जाता है।

आमिर खान की तरह राहुल द्रविड को मिस्‍टर डिपेंडेबल के साथ मिस्‍टर परफेक्‍ट कहां जाता है। उन्‍हें यह दर्जा शास्‍त्रीय शैली की क्रिकेट खेलने की वजह से हासिल हुआ है। हालांकि वह आमिर खान की तरह खुशकिस्‍मत नहीं है कि जो अपनी स्क्रिप्‍ट से लेकर सह कलाकार और निर्देशक तक चुनने के लिए स्‍वतंत्र है। द्रविड के हाथों में न तो विकेट का मिजाज है और नहीं विपक्षी गेंदबाजों के मिजाज को नियंत्रण करने का हथियार। मौसम के बदलते रूख से भी उन्‍हें दो चार होना पड़ता है। इसके बावजूद वह भरोसेमंद बने हुए है। नागपुर में एक वक्‍त लग रहा था कि भारत एक बार फिर बड़ा स्‍कोर खड़ा करने में नाकाम रहेंगा। ऐसे आड़े वक्‍त में द्रविड विकेट पर अंगद के पांव की तरह जम गए। सचिन, लक्ष्‍मण और रैना के मझधार में साथ छोड़ने के बाद भी उनका धैर्य नहीं डगमाया।

नागपुर राहुल द्रविड का ससुराल होने के साथ साथ संतरों की नगरी भी है। नागपुर पहुंचने के पहले द्रविड का बल्‍लेबाजी फार्म भी संतरों की तरह खट्टा मीठा हो रहा था। तकनीक में कहीं कोई दिक्‍कत नहीं थी। विपक्षी गेंदबाजों की गेंद को समझने में वह गच्‍चा खा रहे थे ऐसा भी कुछ नहीं था। बस वह अच्‍छी शुरूआत को बड़ी पारी में बदल नहीं पा रहे थे। नागपुर में धैर्य, जिद और जज्‍बे के साथ वह मैदान में उतरे और फिर एक बड़ी पारी खेलकर ही लौटे। फार्म में वापसी के लिए इससे बेहतर पारी हो भी नहीं सकती थी।


भारतीय टीम के फेब फोर में लक्ष्‍मण के बाद द्रविड ही ऐसे खिलाड़ी है जिन्‍हें वह श्रेय नहीं मिल पाया जिसके वह हकदार रहे है। भारतीय टीम के जीत की बुलंदियों से छूने के सफर में वह हमेशा नींव का पत्‍थर बने रहे। 21 नवंबर की शाम को भी जब द्रविड 67 रन बनाकर नाबाद थे तो किसी का ध्‍यान उन पर नहीं था। हर किसी की जुबां पर केवल और केवल सचिन तेंदुलकर के 50 वें शतक की दहलीज पर खड़े होने की चर्चा थी। 22 नवंबर को सचिन दिन की नौ गेंदों के बाद पैवेलियन लौट गए। एक बार फिर लगा कि न्‍यूजीलैंड के आक्रमण के सामने भारत का मध्‍यक्रम लड़खड़ा जाएगा। ऐसी ही मुश्किल घड़ी में द्रविड टीम के तारनहार बनकर सामने आए। द्रविड के जमाए शतक ने केवल भारतीय पारी की नींव को मजबूती नहीं दी बल्कि इसी शतक की बदौलत भारत श्रृंखला फतह करने में भी कामयाब रहा।


द्रविड हर मुश्किल घड़ी में टीम इंडिया के काम आए। आस्‍ट्रेलिया के खिलाफ ईडन गार्डन में वीवीएस लक्ष्‍मण की 281 रनों की पारी का जिक्र होता है लेकिन विकेट की दूसरी ओर जमे रहकर 180 रनों की पारी खेलने वाले द्रविड को याद नहीं किया जाता। सचिन के शतक और गांगुली की कप्‍तानी में आस्‍ट्रेलिया में मिली टेस्‍ट जीत का समय समय पर जिक्र होता है लेकिन ऐडिलेड में उनकी मैच विनिंग पारी का भूले से भी जिक्र नहीं होता।


राहुल द्रविड की फितरत ही ऐसी है कि उनके लिए बल्‍ले से निकलने वाले रन और टीम की जीत के अलावा कोई बात मायने नहीं रखती। द वॉल को न तो इस बात की कोई शिकन है कि भारतीय टीम की बल्‍लेबाजी का बोझा वह साल दर साल ढो रहे है और ना हीं इस जवाबदारी को लेकर किसी तरह का कोई घमंड। वह उस सैनिक की तरह है जो एक मोर्चा फतह करने के बाद अगला मोर्चा फतह करने के लिए निकल पड़ता है।

कुल जमा राहुल द्रविड का व्‍यक्तित्‍व टीवी पर दिखाए जाने वाले एक सीमेंट कंपनी के विज्ञापन की तरह है। यह विज्ञापन संदेश देता है कि एक खास किस्‍म के सीमेंट से बनी दीवार टूटेगी नहीं।भारतीय टीम की यह दीवार भी करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों की उम्‍मीदों पर यूं ही मजबूती से हर मोर्चे पर खडी है।  विपक्षी गेंदबाजों के हर थपेड़े को झेलने के बाद द वॉल का आवरण चमकदार और विश्वसनीय बना हुआ है।

Friday, November 19, 2010

अतिथि देवो भव:

भारत सरकार पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए अतिथि देवो भव: अभियान चला रही है। इसके प्रचार प्रसार का जिम्‍मा आमिर खान के कंधों पर है। बजट भी लाखों करोड़ों रूपयों का है। अब लगता है सरकार को इसके लिए अपना खजाना खाली करने की जरूरत नहीं है। टीम इंडिया के टॉप 11 खिलाड़ी मुफ्त में इसके ब्रांड एम्‍बेसेडर बन सकते है। न्‍यूजीलैंड के खिलाफ पहले दो टेस्‍ट मैचों के बाद तो कम से कम यह माना ही जा सकता है। दुनिया की नंबर वन टीम ने विदेशी मेहमानों की मेहमाननवाजी में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। पहले अहमदाबाद और फिर हैदराबाद में कीवी टीम के खिलाफ मुकाबले को ससम्‍मान बराबरी पर खत्‍म किया गया।

न्‍यूजीलैंड के खिलाड़ी भारत की सरजमी पर पड़ोसी मुल्‍क बांग्‍लादेश से कड़वी यादें लेकर आए थे। बांग्‍लादेश को क्रिकेट जगत में अपनी धाक अभी जमानी है। इसलिए मेहमान टीम के साथ उसका बर्ताव अच्‍छा नहीं रहा। बल्‍लेबाजों ने कीवी गेंदबाजों का तिरस्‍कार किया तो गेंदबाजों ने अतिथि बल्‍लेबाजों को ज्‍यादा वक्‍त तक क्रीज पर जमे रहने का मौका नहीं दिया। क्रिकेट के सभी फार्मेट में अतिथियों को नीचे दिखाया गया।


बांग्‍लादेश में लूटने पिटने के बाद न्‍यूजीलैंड का पड़ाव भारत में था। बराबरी का मुकाबला तो कतई नहीं कहां जा सकता था। कीवी भी कौन सी शानदार मेहमाननवाजी की उम्‍मीदें लगाकर आए थे। भारत में आने के 20 दिन बाद तस्‍वीर बिलकुल बदली हुई है। उम्‍मीदों के विपरीत कीवी टीम को अब तक के दौरे में अतुल्‍य भारत की तस्‍वीर देखने को मिली है। भारतीय बल्‍लेबाजों ने मेजबान टीम का फर्ज पूरी तरह से अदा किया। उन्‍होंने मेहमान टीम के गेंदबाजों को समय समय पर अपने विकेट उपहार में सौंपे। कभी रन जुटाए भी तो इतने नहीं की मेहमान टीम हार का खतरा महसूस करें।

बल्‍लेबाज जब मेहमाननवाजी में जुटे हो तो गेंदबाज भला कहां पीछे रहने वाले थे। श्रीसंथ, प्रज्ञान ओझा, हरभजन सिंह हर कोई खातिरदारी में जुटा नजर आया। गेंदबाजों ने इतनी दरियादिली दिखाई जितनी तो 2जी स्‍पेक्‍ट्रम घोटाले में संचार मंत्री पद गंवाने वाले ए राजा भी नहीं दिखा पाए। राजा तो राजा कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स आयोजन समिति के अध्‍यक्ष सुरेश कलमाडी भी इस खातिरदारी को देख शर्मसार हो जाए। 



बांग्‍लादेश में न्‍यूजीलैंड ने इतनी मार खाई की वह भूल ही गए थे कि भारत में अतिथि को भगवान का दर्जा दिया जाता है। सदियों से यह परंपरा यहां चली आ रही है। शैलेन्‍द्र ने तो बकायदा शब्‍दों में इसे ढालते हुए लिखा था ‘ मेहमां जो हमारा होता है वो जान से प्‍यारा होता है। यानी जो भी हमारे मुल्‍क आया हमनें उसे खुशी खुशी गले लगा लिया। जिस देश में गंगा बहती है उस देश के क्रिकेटरों से न्‍यूजीलैंड को केवल मेहमानवाजी का नहीं बल्कि समानता का सबक भी सीखने को मिला। वर्ना क्रिकेट की नंबर एक टीम के सामने आठवीं रैंक की टीम की क्‍या बिसात थी। टीम इंडिया ने फिर भी विरोधी टीम को नीचा नहीं दिखने दिया। 

ऊंच नीच, छोटे बड़े का भेद किए बगैर कीवी टीम को बराबरी का दर्जा दिया। पहले टेस्‍ट में लगा कि मेजबान टीम का पलड़ा भारी हो रहा है तो दुनिया के दिग्‍गज बल्‍लेबाजों ने बड़प्‍पन दिखाते हुए आत्‍मसमर्पण कर दिया। हैदराबाद में पांचवे दिन चमत्‍कार की उम्‍मीद जगी तो गेंदबाज कहां पीछे रहने वाले थे। उन्‍होंने मैकुलम को दोहरा शतक जमाने का पूरा मौका दिया।

मेहमानवाजी में थोड़ी चूक होना लाजमी है। हरभजन सिंह जरा ज्‍यादा उत्‍साह में आते दिखें। एक शतक से उनका जी नहीं भरा। आठवे नंबर पर बल्‍लेबाजी करते हुए लगातार दो शतक जमाकर अपना नाम रिकार्ड बुक में दर्ज कराने के बाद ही उनका बल्‍ला रूका। वैसे उनकी यह गुस्‍ताखी माफी के काबिल है। बल्‍लेबाजी करते वक्‍त उन्‍होंने जो गलतियां की उसकी भरपाई गेंदबाजी विभाग में कीवी बल्‍लेबाजों के लिए खतरा नहीं बनकर कर दी। अब बताईए अतिथि देवों भव: को इससे बेहतर ब्रांड एम्‍बेसेडर क्‍या कोई और मिल सकता है। वाकई में भारत अतुल्‍य है।