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Wednesday, April 27, 2011

यादगार लम्हा


एक अरब 21 करोड़ लोगों की दुआ रंग लाई। 28 साल बाद क्रिकेट की दुनिया में भारत का परचम फिर लहराया। मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंडुलकर का अधूरा ख्वाब हकीकत में बदल रहा था। जीवन के सबसे गौरवशाली क्षणों में क्रिकेट का भगवान भी भावुक हो उठा। 22 साल के लंबे कैरियर में जो नहीं हुआ वह देखने को मिला। सचिन का चेहरा आंसूओं से भींगा हुआ था।

सचिन अच्छे अच्छे गेंदबाजों को रूला देते है लेकिन दो अप्रैल की रात को वानखेड़े स्टेडियम पर मास्टर ब्लास्टर की आंखे छलक रही थी। क्रिकेट के मैदान पर बरसों से अपने इमोशन को कन्ट्रोल करने वाले सचिन वर्ल्ड कप की जीत के इस लम्हे को जीकर इतने भावुक हो गए कि आंखों से आंसू रोक नहीं सकें।

टीम इंडिया के खिलाड़ियों के चेहरे आंसूओं से भरे हुए थे। इन दृश्यों के अलावा वर्ल्ड कप जीत के बाद सचिन को अपने कंधों पर उठाए स्टेडियम का चक्कर लगा रहे उनसे आधी उम्र के विराट कोहली की तस्वीर भी सामने आ जाती है तो साथ ही याद आता विराट का उम्मीदों से बढ़कर दिया गया बयान जिसमें सचिन को कंधे पर बैठाकर स्टेडियम का चक्कर लगाने पर वह कहते है ' 21 साल तक देश की उम्मीदों का बोझ उठाया है और आज हमारी बारी थी उन्हें कंधे पर उठाकर सम्मान देने की।'

वर्ल्ड कप जीत का खुमार इतना था कि एक दृश्य जो लोगों के जेहन में बस नहीं पाया। यह वह क्षण था जब मैच के बाद सचिन तेंडुलकर इंटरव्यू दे रहे थे। इस दौरान सचिन फिर भावुक हो उठे थे। ऐसे में इंटरव्यू लेने वाले संजय मांजरेकर पर किसी की नजर नहीं पड़ी।


यह वही संजय मांजरेकर थे जो कुछ सालों पहले सचिन पर अपने कड़वे बोलों से लिपटे बयानों की बाउंसर फेंक रहे थे। कभी सचिन को असफलताओं से डरने वाला बताया तो आए दिन घायल होने और उनकी फिटनेस पर सवाल खड़े किए। आस्ट्रेलिया के खिलाफ जब भारत 351 रनों के भारी भरकम लक्ष्य से तीन रन दूर रह गया था तब भी मांजरेकर सचिन पर बरस पड़े थे। सचिन 175 रनों की पारी खेलने के बाद आउट हुए थे। इतने नजदीक पहुंचने के बाद मुकाबला नहीं जीतने पर सचिन को अफसोस रहा लेकिन मांजरेकर को उस समय भी कटाक्ष करने का मौका मिल गया था। मांजरेकर ने कहा कि मुझे पता था कि सचिन आखिरकार टीम को निराश कर जाएंगे जैसा उन्होंने पहले भी किया है। पहले भी कई ऐसे मौके रहे हैं, जब सचिन टीम को जीत की दहलीज पर पहुंचाकर खुद ही फिसल गए और अब एक बार फिर उन्होंने ऐसा ही किया।

सचिन तेंडुलकर अमूमन संजय मांजरेकर की आलोचनाओं का जवाब देने से बचते रहे। केवल मांजरेकर नहीं बल्कि किसी भी आलोचना का जवाब अपने बल्ले से देने वाले सचिन ने वर्ल्ड कप में भी कुछ ऐसा ही करिश्मा किया था। एक दौर में लगातार हो रही आलोचना के बाद सचिन ने जवाब दिया था कि उन पर जो पत्थर फेके जाते है वह उन्हे माइल स्टोन में बदलने में भरोसा रखते है। वर्ल्ड कप जीतने के बाद सचिन एक बार फिर उस बात को सार्थक करते नजर आए। संजय इन बातों को समझ न पाए क्योंकि वह माइल स्टोन बनाने में नहीं बल्कि शायद पत्थर फेंकने में ज्यादा भरोसा करते है।

Monday, April 25, 2011

सचिन की रूहानी मोहब्बत


क्रिकेट एक जुनून है और सचिन उस जुनून का दूसरा नाम ... लेकिन बात यहीं नहीं ठहरती .. सचिन क्रिकेट के जुनूनी प्लेयर से शायद आगे बढ़कर हैं ... क्रिकेट उनकी मोहब्बत है ... सचिन और क्रिकेट की मोहब्बत देख उमराव जान का वह संवाद याद आ जाता है जिसमें कोठे में बैठा एक बुजुर्ग उमराव जान से कहता है 'या तो किसी की हो जाओ या किसी को अपना बना लो।' सचिन तेंडुलकर और क्रिकेट की मोहब्बत का फलसफा भी कुछ ऐसा ही है। सचिन तेंडुलकर क्रिकेट के हो गए।

सत्य साईं बाबा के निधन के बाद बेहद दुखी थे। कयास लगाए जा रहे थे कि सचिन डेक्कन चार्जर्स के खिलाफ मैच में न खेलें लेकिन सचिन का क्रिकेट के प्रति प्यार समर्पण औऱ जुनून ही था जो उन्हें मुकाबले तक खींच लाया। सचिन चाहते तो न खेलने का फैसला कर सकते थे। लेकिन क्रिकेट का भगवान अपने कर्तव्य पथ से कभी अलग नहीं हो सकता। भारी मन से ही सही लेकिन सचिन मैदान में उतरे और अपनी टीम को जीत दिलाई। 

सचिन का ये जुनून, खेल के लिए उनका समर्पण पहले भी देखा गया है। सचिन के पिताजी का 1999 के वर्ल्ड कप के दौरान निधन हो गया। सचिन वर्ल्ड कप के बीच में ही घर आए और पिताजी का अंतिम संस्कार के बाद तुरंत लौट गए। यही नहीं उन्होंने कीनिया के खिलाफ शानदार शतक ठोका औऱ आकाश में भरी नजरों से देखा शायद अपने दिवंगत पिता को यही कहा होगा कि आप देखिए आपका बेटा अपने कर्तव्य पथ पर अडिग है।

सचिन जानते हैं कि उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं।  इसका मतलब ये नहीं कि वो भावुक नहीं। जिन्हें लगता है कि सचिन भावुक नहीं और केवल जुनूनी व्यक्ति हैं उन्हें याद करना होगा कीनिया के खिलाफ मैच शतक मारने के बाद क्रिकेट के इस दीवाने की आंखे भी नम हो गई थी। मानो वो शतक उन्होंने अपने पिता को याद करते हुए ही बनाया था। इस बार भी आध्यात्मिक आराध्य सत्य साईं बाबा के निधन के बाद सचिन जब उन्हें श्रृद्धाजलि देने पहुंचे तो आंखों में आंसू उमड़ पड़े। आखिर सचिन भी एक इंसान हैं और इंसान अपनी भावनाओं के आगे हमेशा विवश हो जाता है। सचिन की भावुक भावनाएं भी छलक उठी।

इंसान होने के नाते सचिन भावुक हैं तो क्रिकेटर होने के तौर पर प्रोफेशनल प्लेयर हैं।  क्रिकेट प्रति उनकी यह जीवटता, समर्पण और कभी न हार मारने का जज्बा ही उन्हें दुनिया के बाकी क्रिकेटरों की जमात में काफी आगे रखता है। इतना आगे कि कोई उन तक पहुंच भी नहीं पाता है। सचिन और क्रिकेट एक दूजे के होकर रह गए है। क्रिकेट को धर्म माना जाता है तो सचिन को यूं ही भगवान का दर्जा नहीं दिया गया है। सचिन ने भी जीवन के अहम मौकों पर बता दिया कि दुनिया भले ही उन्हें भगवान कहती हो लेकिन क्रिकेट उनके लिए भी एक धर्म ही है।

क्रिकेट से मोहब्बत और जीवटता के मामले में सचिन के करीब कोई नजर आता है तो वह दिल्ली के विराट कोहली है। साल 2006 में कर्नाटक के खिलाफ रणजी ट्राफी मुकाबले में दिल्ली की टीम मुसीबत में थी। दिल्ली की सारी उम्मीदें विराट कोहली पर टिकी हुई थी जो दिन का खेल खत्म होने पर 40 रनों पर नाबाद थे। विराट अगले दिन बल्लेबाजी शुरू कर पाते इसके पहले ही उनके पिता के निधन की खबर आ जाती है। पिता को अंतिम विदाई देने के पहले विराट फिरोजशाह कोटला पर 90 रनों की पारी खेल अपनी टीम के लिए तारणहार बनते है। किसी भी खेल के लिए जो जूनुन चाहिए वह सचिन या विराट में नजर आता है जो किसी आम इंसान के बस का नहीं है।

खेल हो या मोहब्बत। दुनिया उसी को सलाम करती है जिन्होंने खुद को इसके लिए समर्पित कर दिया।। हीर-रांझा, लैला-मजनूं, शीरी-फरहाद, रोमियो-जूलियट जैसे प्रेमियों को दुनिया आज भी याद करती है। सचिन और क्रिकेट की मोहब्बत भी बस कुछ ऐसी ही है।