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Monday, April 25, 2011

सचिन की रूहानी मोहब्बत


क्रिकेट एक जुनून है और सचिन उस जुनून का दूसरा नाम ... लेकिन बात यहीं नहीं ठहरती .. सचिन क्रिकेट के जुनूनी प्लेयर से शायद आगे बढ़कर हैं ... क्रिकेट उनकी मोहब्बत है ... सचिन और क्रिकेट की मोहब्बत देख उमराव जान का वह संवाद याद आ जाता है जिसमें कोठे में बैठा एक बुजुर्ग उमराव जान से कहता है 'या तो किसी की हो जाओ या किसी को अपना बना लो।' सचिन तेंडुलकर और क्रिकेट की मोहब्बत का फलसफा भी कुछ ऐसा ही है। सचिन तेंडुलकर क्रिकेट के हो गए।

सत्य साईं बाबा के निधन के बाद बेहद दुखी थे। कयास लगाए जा रहे थे कि सचिन डेक्कन चार्जर्स के खिलाफ मैच में न खेलें लेकिन सचिन का क्रिकेट के प्रति प्यार समर्पण औऱ जुनून ही था जो उन्हें मुकाबले तक खींच लाया। सचिन चाहते तो न खेलने का फैसला कर सकते थे। लेकिन क्रिकेट का भगवान अपने कर्तव्य पथ से कभी अलग नहीं हो सकता। भारी मन से ही सही लेकिन सचिन मैदान में उतरे और अपनी टीम को जीत दिलाई। 

सचिन का ये जुनून, खेल के लिए उनका समर्पण पहले भी देखा गया है। सचिन के पिताजी का 1999 के वर्ल्ड कप के दौरान निधन हो गया। सचिन वर्ल्ड कप के बीच में ही घर आए और पिताजी का अंतिम संस्कार के बाद तुरंत लौट गए। यही नहीं उन्होंने कीनिया के खिलाफ शानदार शतक ठोका औऱ आकाश में भरी नजरों से देखा शायद अपने दिवंगत पिता को यही कहा होगा कि आप देखिए आपका बेटा अपने कर्तव्य पथ पर अडिग है।

सचिन जानते हैं कि उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं।  इसका मतलब ये नहीं कि वो भावुक नहीं। जिन्हें लगता है कि सचिन भावुक नहीं और केवल जुनूनी व्यक्ति हैं उन्हें याद करना होगा कीनिया के खिलाफ मैच शतक मारने के बाद क्रिकेट के इस दीवाने की आंखे भी नम हो गई थी। मानो वो शतक उन्होंने अपने पिता को याद करते हुए ही बनाया था। इस बार भी आध्यात्मिक आराध्य सत्य साईं बाबा के निधन के बाद सचिन जब उन्हें श्रृद्धाजलि देने पहुंचे तो आंखों में आंसू उमड़ पड़े। आखिर सचिन भी एक इंसान हैं और इंसान अपनी भावनाओं के आगे हमेशा विवश हो जाता है। सचिन की भावुक भावनाएं भी छलक उठी।

इंसान होने के नाते सचिन भावुक हैं तो क्रिकेटर होने के तौर पर प्रोफेशनल प्लेयर हैं।  क्रिकेट प्रति उनकी यह जीवटता, समर्पण और कभी न हार मारने का जज्बा ही उन्हें दुनिया के बाकी क्रिकेटरों की जमात में काफी आगे रखता है। इतना आगे कि कोई उन तक पहुंच भी नहीं पाता है। सचिन और क्रिकेट एक दूजे के होकर रह गए है। क्रिकेट को धर्म माना जाता है तो सचिन को यूं ही भगवान का दर्जा नहीं दिया गया है। सचिन ने भी जीवन के अहम मौकों पर बता दिया कि दुनिया भले ही उन्हें भगवान कहती हो लेकिन क्रिकेट उनके लिए भी एक धर्म ही है।

क्रिकेट से मोहब्बत और जीवटता के मामले में सचिन के करीब कोई नजर आता है तो वह दिल्ली के विराट कोहली है। साल 2006 में कर्नाटक के खिलाफ रणजी ट्राफी मुकाबले में दिल्ली की टीम मुसीबत में थी। दिल्ली की सारी उम्मीदें विराट कोहली पर टिकी हुई थी जो दिन का खेल खत्म होने पर 40 रनों पर नाबाद थे। विराट अगले दिन बल्लेबाजी शुरू कर पाते इसके पहले ही उनके पिता के निधन की खबर आ जाती है। पिता को अंतिम विदाई देने के पहले विराट फिरोजशाह कोटला पर 90 रनों की पारी खेल अपनी टीम के लिए तारणहार बनते है। किसी भी खेल के लिए जो जूनुन चाहिए वह सचिन या विराट में नजर आता है जो किसी आम इंसान के बस का नहीं है।

खेल हो या मोहब्बत। दुनिया उसी को सलाम करती है जिन्होंने खुद को इसके लिए समर्पित कर दिया।। हीर-रांझा, लैला-मजनूं, शीरी-फरहाद, रोमियो-जूलियट जैसे प्रेमियों को दुनिया आज भी याद करती है। सचिन और क्रिकेट की मोहब्बत भी बस कुछ ऐसी ही है।

Monday, October 11, 2010

सचिन, सचिन, सचिन....





16 नवंबर, 2007 ग्‍वालियर वन डे। पाकिस्‍तान के खिलाफ सचिन तेंडुलकर 97 रन बनाकर क्रीज पर थे। स्‍टेडियम में मौजूद हजारों दर्शक ही नहीं देश भर में सचिन के करोड़ों चाहने वाले उनका शतक पूरा होने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। उमर गुल की एक गेंद पर सचिन चूक गए। पाकिस्‍तान के खिलाफ यह लगातार दूसरा मौका और 2007 के सीजन में ऐसा छठी बार हो रहा था जब सचिन नर्वस नाईंटीज का शिकार हुए थे। उस वक्‍त सचिन के सात साल के बेटे अर्जुन ने पापा को सलाह दी थी कि वह 94 रन बनाने के बाद छक्‍का लगाकर क्‍यों नहीं अपना शतक पूरा कर लेते।


लगभग तीन साल बाद मोहाली में सचिन दो रन से 49 वां शतक बनाने से चूक गए थे। बेंगलुरू में ऐसा न हो इसके लिए सचिन ने 94 के स्‍कोर तक पहुंचने के पहले भी छक्‍का जमाया और शतक भी छक्‍का जमाकर पूरा किया। दरअसल, सचिन का कैरियर हर वक्‍त कुछ नया सीखने की ललक के साथ आगे बढा है। सचिन के लिए कभी यह महत्‍वपूर्ण नहीं रहा कि सलाह देने वाला कौन है।  दिमागी चतुराई औऱ दमखम के  इस खेल में सचिन के लिए हर सलाह और सबक ही महत्‍वपूर्ण रहा है। फिर चाहे यह अपने नन्हे बेटे से ही क्‍यों न मिली हो।


मुंबईकर के लिए लोकल, दिल्‍ली वालों के लिए मेट्रो और इंदौरवासियों के लिए सिटी बस को लाइफ लाइन माना जाता है। इनमें सफर कर इन शहरों की धडकन को आसानी से महसूस किया जा सकता है। सचिन ऐसे ही एक अरब बीस करोड लोगों के दिलों की धडकन है। हर शतक के बाद उनका वो हेलमेट निकालना...कुछ पलों के लिए आसमां की ओर देखना। फिर हेलमेट और बल्‍ला उपर कर दर्शकों का अभिवादन करना और फिर हेलमेट पर लगे राष्‍ट्रीय ध्‍वज को चूमना। सचिन की सफलता को व्‍यक्तिगत सफलता मानना और उनकी असफलता पर दुखी होना। 21 सालों से देश को सचिन की आदत सी हो गई है।

सचिन के शतक के देश के लिए क्‍या मायने है इसके लिए आस्‍ट्रेलियाई क्रिकेट लेखक पीटर रिबोक के अनुभव से बेहतर कोई और बात नहीं हो सकती। पीटर एक बार शिमला से दिल्‍ली लौट रहे थे। किसी स्‍टेशन पर ट्रेन रूकी हुई थी। सचिन शतक के करीब थे और 98 रनों पर बल्‍लेबाजी कर रहे थे। ट्रेन के यात्री, रेलवे अधिकारी और ट्रेन में मौजूद हर कोई इंतजार कर रहा था कि सचिन अपना शतक पूरा करे। यह जीनियस बल्‍लेबाज भारत में समय को भी रोक सकता है।


पिछले दो दशक से बल्‍ला थामने वाले हर बच्‍चे का ख्‍वाब सचिन तेंदुलकर जैसे ही सफलता अर्जित करना ही रहा है। टीम इंडिया के कप्‍तान एम एस धोनी हो या फिर नजफगढ के सुल्तान वीरेन्‍द्र सहवाग, सभी सचिन के खेल को देखते हुए ही बडे हुए। बेंगलुरू में पहला टेस्‍ट खेल रहे चेतेश्‍वर पुजारा की उम्र तो महज एक साल थी जब सचिन तेंदुलकर ने अन्‍तर्राष्‍ट्रीय क्रिकेट में पर्दापण किया था। सचिन की खासियत यह रही कि सफलता के नित नए पैमाने बनाने के बावजूद उनके कदम जमीन पर ही रहे। यही वजह है कि केवल क्रिकेटर ही नहीं शटलर साइना नेहवाला, बाक्सिंग के दबंग विजेंदर हो, टेनिस सनसनी सानिया मिर्जा या फिर पाकिस्‍तान के जाने माने पेनल्‍टी कार्नर विशेषज्ञ सुहैल अब्‍बास, हर कोई सचिन तेंदुलकर को आदर्श का मानता है।

16 नवंबर को सचिन इंटरनेशनल क्रिकेटिंग कैरियर के 21 साल पूरे कर लेंगे। सचिन जिस मुकाम पर है उस तक पहुंचना तो दूर की बात है, उसके बारे में सोचना भी किसी क्रिकेटर के लिए एक बडे पराक्रम से कम नहीं होगा। सचिन ने जब टेस्‍ट क्रिकेट शुरू किया था, लगभग उसी वक्‍त देश में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ था। देश ने पिछले 21 सालों में इस दौर के अच्छे और बुरे दोनों अनुभव देखे हैं। सचिन ने इन 21 सालों मे क्रिकेट की एकमेव सत्ता अपने हाथों में रखी है। देश ने वह दौर भी देखा है जब इंडिया का मतलब इंदिरा और इंदिरा का मतलब इंडिया माना जाता है राजनीति की भाषा में कहें तो आज क्रिकेट का मतलब सचिन हो गया है।

Thursday, September 2, 2010

नापाक खिलाड़ी- नाकाम मुल्‍क


पाकिस्‍तान यानि पवित्र या पाक भूमि। यह पाक भूमि इस वक्‍त दुनिया की सबसे भीषणतम प्राकृतिक आपदा झेल रही है। आसमानी कहर 2000 से ज्‍यादा लोगों की जान ले चुका है। दो करोड़ से ज्‍यादा पाकिस्‍तानी इस आपदा में सब कुछ गंवाकर बेघर हो गए है। निराशा और बेबसी डूबा यह मुल्‍क इस आपदा से उबरने की कोशिश करता इसके पहले क्रिकेट में आए भूचाल ने पानी में डूबे पाकिस्‍तानियों का सिर शर्म से ओर झुका दिया है। रमजान के पाक माह में क्रिकेटरों की नापाक हरकतों ने जिन्‍ना के मुल्‍क में मैच फिक्सिंग का जिन्न फिर जाग गया है।
 
पाकिस्‍तान क्रिकेटरों की फिक्सिंग ने 63 साल से दुनिया के नक्‍शे पर खास पहचान बनाने के लिए जुझ रहे इस मुल्‍क को लेकर नये सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है। पाक खिलाडि़यों की इस करतूत को महज खेल में फिक्सिंग भर ये जोडकर नहीं देखा जाना चाहिए। इसकी जड़े कही गहरी एक मुल्‍क के नाकाम होने से जुड़ी हुई है। क्‍योंकि संकट के इस दौर में मुल्‍क का निजाम बाढ़ में डूबी जनता के दुख दर्द दूर करने की बजाए यूरोपीय देशों में मजे लूट रहा था।  शिक्षा और रोजगार के अभाव में पहले ही पाकिस्‍तानी युवा रॉकेट लांचर और एके 47 को थामने से गुरेज करते नहीं दिखते है। ऐसे में क्रिकेटरों की यह सौदेबाजी मुल्‍क के बिखराव के संकेत है। मुल्‍क के सबसे लोकप्रिय खेल की नुमाइंदगी में फख्र महसूस करने की बजाए उसकी आबरू का सौदा,  इससे ज्‍यादा शर्मिन्‍दगी किसी मुल्‍क के लिए और क्‍या हो सकती है।


इस मुल्‍क में क्रिकेटर, राजनेताओं और सैन्‍य शासक तीनों की फितरत एक जैसी नजर आती है। सभी कल हो ना हो की होड़ में मुल्‍क को बेचने से भी परहेज नहीं कर रहे है। क्रिकेटरों को लगता है कि कल खेलने को मिले या न मिले आज जितना माल कूट सकते है कूट लिया जाए। मुशर्रफ, जरदारी, नवाज शरीफ और जनरल जिया उल हक किसी को भी भरोसा नहीं रहा कि अगले पल उनकी कुर्सी सलामत रहेगी या नहीं। इसी के चलते किसी ने जमकर भ्रष्‍टाचार किया तो किसी ने अपने ही मुल्‍क के बाशिंदें को निर्वासित होने या फिर उसकी जिंदगी का सौदा करने का मौका भी नहीं छोड़ा।


पाकिस्‍तान की इस बदहाली पर इंटरनेट पर मौजूद दस्‍तावेजों को जरा नजर दौड़ाई जाए तो पिछले साल अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत हुसैन हक्कानी की 14 वर्षीय बेटी मीरा हुसैन हक्कानी एक खत का जिक्र मिलता है। अखबार 'द न्यूज' में प्रकाशित 'अल्लाह के नाम खत'  में मीरा लिखती हैं, 'आजादी मिलने के 62 साल बाद भी पाकिस्तान खौफजदा है। भले ही उसके पास काफी जमीन है। लेकिन वह तबाह हो चुका है। उसके पर्वत कमजोर और बेसहारा हैं। गोलियों तथा बम धमाकों के कारण कभी खूबसूरत रही इसकी वादियां खाक में मिल चुकी हैं। उसके बच्चे भूखे हैं और आंसू बहा रहे हैं। यही पाकिस्तान है।' एक साल बाद अब शायद मीरा सोच रही होगी कि अशिक्षित, लाचार और बेसहारा लोगों ने मजबूरी में यह सब कुछ किया हो  लेकिन लाखों करोड़ों में खेलने वाले क्रिकेटर के के सामने तो ऐसी कोई मजबूरी नहीं थी। क्रिकेटरों की यह करतूत आत्‍मघाती हमले जैसी है, जिससे वह न तो खुद बच पाएंगे और नहीं मुल्‍कवासियों को चैन की सांस लेने देंगे।


19 साल का युवा क्रिकेटर मोहम्‍मद आमिर जो लॉडर्स टेस्‍ट के पहले दिन पाकिस्‍तान का हीरो था वह अब खलनायक बन चुका है। वसीम अकरम से भी शातिर और पैनी जिसकी गेंदबाजी मानी जा रही थी उसका कैरियर शुरू होने के पहले ही खत्‍म होने का खतरा मंडरा रहा है। पाकिस्‍तान के न जाने कितने खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर बनने का ख्‍वाब देखते है लेकिन उन्‍होंने मास्‍टर ब्‍लास्‍टर से कोई सब‍क नहीं लिया। सचिन ही है जिन्‍होंने इंग्‍लैंड के खिलाफ चेन्‍नई में शतक जमाते हुए एक अरब भारत वासियों को मुंबई हमले के गम से बाहर निकालने में मदद की थी। पाकिस्‍तान के नापाक खिलाडि़यों ने तो बाढ़ में डूबे अपने देशवासियों की पीड़ा को बढ़ाते हुए उन्‍हें ओर गर्त में डूबो दिया है। यहां मसला किसी एक कौम का नहीं है। पाकिस्‍तानी टीम की नुमाइंदगी करने वाले दानिश कनेरिया भी फिक्सिंग में फिक्‍स हो चुके है। यह जनाब तो काउंटी मुकाबलों में फिक्‍स करने के चलते ब्रिटिश हवालात की हवा भी खा चुके है।


राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी के विचारों में राष्‍ट्रीयता की सबसे खरी परीक्षा तो आखिर यही है कि हम राष्‍ट्र का हित बिलकुल उसी तरह देखें मानो वह हमारा व्‍यक्तिगत हित हो। पाकिस्‍तान में व्यक्तिगत हित को ही राष्‍ट्र का हित मान‍ लिया गया है। वहीं मुंशी प्रेमचंद के शब्‍दों में जिस सभ्यता का केन्‍द्र बिंदु स्‍वार्थ हो, वह सभ्‍यता नहीं अपितु संसार के लिए अभिशाप है और समूचे विश्‍व के लिए विपत्ति है। क्रिकेट में फिक्सिंग से लेकर आतंकियों की शरणस्‍थली बनने तक पाकिस्‍तान पूरी दुनिया के लिए विपत्ति ही बनता जा रहा है। कमजोर और अस्थिर पड़ोसी से भारत की चिंता कम होने की बजाए बढ़ना ही है। कराची में अपनी कब्र में जिन्‍ना इस वक्त करवट लेकर उस घड़ी को कोस रहे होंगे जब उन्‍होंने धर्म के आधार पर दो मुल्‍कों की कल्‍पना की थी।

Monday, August 2, 2010

बुलेटप्रूफ



भारतीय सैन्‍यबल इस वक्‍त अस्‍सी हजार से ज्‍यादा बुलेटप्रूफ जैकेट की कमी से जुझ रहे है। सरकार की ओर से बकायदा संसद में आधिकारिक तौर पर यह जानकारी दी गई है। मुंबई आतंकी हमले के वक्‍त भी सुरक्षाबलों के पास मौजूद बुलेटप्रूफ जैकेट की कमजोरियां सामने आई थी। देश पर हुए सबसे बड़े आतंकी हमले के बाद से ही बुलेटप्रूफ जैकेट को लेकर चिंताए बढ़ती जा रही है। बुलेटप्रूफ जैकेट को ले‍कर चिंता स्‍वाभाविक भी है लेकिन टीम इ‍ंडिया के लिए फिक्र की कोई बात नहीं है। टीम इंडिया के पास सचिन तेंदुलकर के रूप में एक ऐसा बुलेटप्रूफ जैकेट है जो 21 साल से हर मुसीबत का बखूबी सामना करता आया है।




मेड इन मुंबई सचिन तेंदुलकर भारतीय टीम के लिए संकटमोचक है। टीम जब भी मुसीबत में होती है तो साथी खिलाड़ी ही नहीं एक अरब से ज्‍यादा लोगों की उम्‍मीदें केवल और केवल सचिन पर टिकी होती है। श्रीलंका दौरे पर भी सचिन ही टीम इंडिया के लिए सुरक्षा कवच साबित हो रहे है। गॉल टेस्‍ट में वह शतक से चूके लेकिन टीम इंडिया को पारी की हार से वह बचाकर ले गए थे। मलिंगा, मेंडिस और मुरलीधरन के एम फेक्टर के हर तीर की धार सचिन के बल्‍ले से टकरा कर कुंद होती गई। कोलंबो में जब भारतीय टीम श्रीलंका के विशालकाय स्‍कोर के सामने मुश्किल में फंस गई उस वक्‍त सचिन ने ही टीम को मुसीबत के भंवर से सुरक्षित बाहर निकाला। अजीमों शान शहंशाह ने अपने टेस्‍ट कैरियर का पांचवा दोहरा शतक जमाया। क्रिकेट के सरताज ने अपनी पारी से टीम इंडिया के नंबर वन के ताज को बचा लिया।



37 साल के सचिन तेंदुलकर इन दिनों एक विज्ञापन में नजर आ रहे है। इस विज्ञापन की थीम है जो अंदर से है सॉलिड वही फेवरेट है। सचिन के जिंदगी का फलसफा भी कुछ ऐसा ही है। कोलंबो में दोहरा शतक जमाकर उन्‍होंने बता दिया कि उम्र के साथ साथ वह दिन ब दिन सॉलिड होते जा रहे है। जहां त‍क बात उनको फेवरेट मानने वालों की है तो वह सूची सेंसेक्‍स की तरह उपर नीचे नहीं होती रहती। वह तो महंगाई डायन जैसी है जो बस तेजी से बढ़ती ही जा रही है। ट्विटर पर थोड़े ही समय में प्रशंसकों के मामले में वह शाहरूख खान और प्रियंका चोपड़ा के करीब पहुंच चुके है। यह माइक्रो ब्‍लागिंग वेबसाइट उनकी लोकप्रियता का एक छोटा नमूना भर है।



चिन की खासियत है कि आलोचकों के फेंके पत्‍थरों को वह हथियार बनाकर हमला करने में विश्‍वास नहीं करते। वह इन पत्‍थरों को माइल स्‍टोन में बदल देते है। दरअसल सचिन सचिन है उनके जैसा दूजा नहीं। एक अरब से ज्‍यादा आबादी वाले इस मुल्‍क में वह एकमात्र ऐसे शख्‍स है जो एक साथ सबके चेहरे पर खुशियां ला सकते है। यही वजह है कि जब सचिन को चोट लगती है तो पूरा देश उस दर्द को महसूस करता है। सचिन यदि शतक के नजदीक होतो क्रिकेट प्रेमी उनसे ज्‍यादा तनाव महसूस करता है। पिछले 21 साल से वह हर क्रिकेट प्रेमी के दिल में धड़क रहे है।



याद कीजिए 26 नवंबर 2008 की वह काली रात। मुंबई को समंदर के रास्‍ते आए आतंकियों ने दहला दिया था। भारत में वन डे श्रृंखला में बुरी तरह शिकस्‍त खा चुकी इंग्‍लैंड टीम हमले के बाद दौरा छोड़कर स्‍वदेश लौट गई थी। हालात सुधरने के बाद इंग्‍लैंड टीम वापस भारत लौटी और चेन्‍नई में पहले ही टेस्‍ट में जीत की दहलीज पर पहुंच गई। 387 रनों के लक्ष्‍य का पीछा करते हुए सचिन ने ऐतिहासिक शतक लगाया और भारत को एक अविश्‍वसनीय जीत दिला दी। सचिन के शतक ने बिखरे बिखरे नजर आ रहे देश को फिर से जोड़ दिया। सचिन की इस पारी ने मुंबई हादसे के बाद जिंदगी को फिर से पटरी लाने में अहम रोल अदा किया।




सचिन उन सैनिकों के दिल में भी बसते है जिन्‍होंने सरहद हो या आतंरिक सुरक्षा हमेशा अपनी जान हथेली पर रखकर देश की एकता और अखंडता को सुरक्षित रखा है। शून्‍य से कई डिग्री नीचे तापमान में हो या फिर रेगिस्‍तान के मुश्किल हालात भारतीय सैनिकों ने हर मोर्चा जीता है। इन सैनिकों में लता मंगेशकर के सुरों की तरह सचिन के बल्‍ले से निकले रन जोश भर देते है। उम्‍मीद की जाना चाहिए की देश के सैनिकों को भी सचिन तेंदुलकर जैसा मजबूत बुलेटप्रूफ जैकेट मिलेगा जो लंबे समय तक बगैर चूके उनकी जिंदगी की सुरक्षा करता रहेगा।

Saturday, July 24, 2010

एम बोले तो मुरलीधरन

मैं कर सकता हूं नहीं यह मेरा घमंड नहीं विश्‍वास है। विश्‍वास और घमंड में बहुत  कम फर्क है। मैं कर सकता हूं, यह मेरा विश्‍वास है। सिर्फ मैं ही कर सकता हूं यह मेरा घमंड है।
गजनी फिल्‍म के हैविवेट सुपररिच मालिक संजय सिंघानिया का यह डॉयलाग श्रीलंका के जादुई गेंदबाज मुथैया मुरलीधरन पर सौ फीसदी खरा उतरा है। 18 साल का लंबा टेस्‍ट कैरियर 800 विकेट की बुलंदियों को केवल इसी थीम पर छू पाया कि मैं कर सकता हूं यह मेरा विश्‍वास है। आत्‍मविश्‍वास, चुनौतियों से निपटना, खुद के सामने बडा लक्ष्‍य रख उसे हासिल करना और टीम भावना जैसे शब्‍दों से जादुई ऑफ स्पिनर मुथैया मुरलीधरन के कैरियर का खाका खींचा जा सकता है। उनका खेल कैरियर मनोबल बढाने वाली किताब को पढने जैसा है।


बिस्किट बनाने वाले परिवार में जन्‍में मुरलीधरन कभी यह मुकाम पाएंगे किसी ने ख्‍वाब में भी नहीं सोचा होगा। मुरली को बचपन से ही यह अच्‍छे से मालूम था कि बिस्किट तभी कुरकुरा और स्‍वादिष्‍ट तैयार होता है जब वह भट्टी की तेज आंच में तपकर निकलें। बॉलिंग एक्‍शन और शुरूआती असफलताओं के बाद आलोचकों की भट्टी में उनकी खूब सिकाई हुई। आलोचनाओं की आंच से डरे बगैर मुरली की गेंदबाजी निखरती गई।  बालिंग एक्‍शन पर सवाल उठाकर उनके कैरियर को खत्‍म करने की कोशिश भी की गई। मुरलीधरन हर चुनौती से अपनी चिर परिचित मुस्‍कान के साथ विजेता की तरह निकले। 18 साल बाद जब मुरलीधरन ने टेस्‍ट क्रिकेट को विदा कहां तो वह उस मुकाम पर खडे है जहां कोई भी गेंदबाज पहुंच नहीं पाया है।


मुरलीधरन के पास 800 विकेट के शिखर को छूने के लिए भारत के खिलाफ तीन टेस्‍ट मैचों की श्रृंखला थी। दुनिया के इस सर्वश्रेष्‍ठ गेंदबाज ने केवल एक टेस्‍ट के बाद संन्‍यास का ऐलान कर सबको चौंका दिया था, क्‍योंकि उन्‍हें खुद पर विश्‍वास था कि वह एक ही टेस्‍ट में आठ विकेट लेने का माद्दा रखते है। वह भी दुनिया की सर्वेश्रेष्‍ठ बैटिंग लाइन के खिलाफ जिसमें मास्‍टर ब्‍लास्‍टर सचिन तेंदुलकर, द वॉल राहुल द्रविड, नजफगढ का सुल्‍तान वीरेन्‍द्र सहवाग और वेरी वेरी स्‍पेशल लक्ष्‍मण हो। मुरलीधरन ने अपने पूरे कैरियर में खुद के सामने मुश्किल लक्ष्‍य रखे है और उन्‍हें हासिल करने का जज्‍बां भी दिखाया है। यही वजह है कि इस ग्रह पर 800 टेस्‍ट विकेट लेने वाले वह पहले मानव बन गए।


मुरलीधरन केवल श्रीलंका में नहीं भारत में भी खासे लोकप्रिय है। दोनों मुल्‍कों के बीच रिश्‍तें त्रेता युग से रहे है। 20 वीं शताब्‍दी में रेडियो सिलोन और फिर लिट्टे के खिलाफ भारतीय शांति सेना के अभियान ने दोनों देशों को फिर जोडा। राजीव गांधी की हत्‍या के बाद श्रीलंकाई तमिलों के खिलाफ नाराजगी भी हुई, लेकिन 21 वी सदी में श्रीलंकाई तमिल खिलाडी मुथैया मुरलीधरन भारत में सबसे चहेते विदेशी क्रिकेटर हो गए। चेन्‍नई सुपर किंग्‍स के लिए खेलने वाले इस खिलाडी ने रेडियो सिलोन जैसी ही लोकप्रियता भारत में हासिल की। यही वजह है कि भारतीय क्रिकेट प्रेमी चाहते थे कि मुरली 800 विकेट हासिल करें लेकिन ख्‍वाहिश बस इतनी सी थी कि टेस्‍ट में भारत को हार का मुंह न देखना पडे।


दुनिया में सबसे ज्‍यादा टेस्ट और वन डे रन बनाने वाले मास्‍टर ब्‍लास्‍टर सचिन तेंदुलकर की तरह मुरलीधरन भी तेज गेंदबाज बनना चाहते थे। सचिन ने गेंद छोड़ बल्‍ला थामा तो मुरलीधरन ने गति को छोड़कर फिरकी को अपनाया। दोनों का यह निर्णय रिकार्ड बुक के वजन को बढाने वाला सा‍बित हुआ। खास बात यह है कि मुरली का इंटरनेशनल कैरियर में आगाज धमाकेदार नहीं हुआ था। इसके बाद भी मुरली ने हिम्‍मत नहीं हारी। कड़ी मेहनत और लड़ाकू क्षमता की बदौलत वह बरसों से श्रीलंका टीम के आधारस्‍तंभ बने रहें। मुरली केवल एक अच्‍छे क्रिकेटर नहीं बल्कि इंसान भी है। सुनामी ने जब श्रीलंका को बर्बाद कर दिया था उस वक्‍त उन्‍होंने सुनामी पीडितों के पुनर्वास में खासा काम किया था। श्रीलंकाई क्रिकेट प्रेमी मुरली को उसी तरह से पूजता है जिस तरह भारत में सचिन तेंदुलकर को भगवान माना जाता है। 


क्रिकेट की दुनिया में अब तक की सबसे यादगार विदाई मुरलीधरन की ही रही है। डॉन ब्रैडमेन अपनी आखरी पारी में चार रन बनाने से चूक गए थे तो लिटिल मास्‍टर सुनील गावस्‍कर भी आखरी पारी में चार रनों से शतक से चूक गए थे। मुरली इन सबसे परे अपने टेस्‍ट कैरियर की आखरी गेंद पर न केवल विकेट लेने में कामयाब रहे बल्कि उन्‍होंने अपनी टीम को जीत दिलाने में भी अहम रोल अदा किया। कहां ये जाता है कि खेल और खिलाडी के मुकाबले में अंत में जीत खेल की ही होती है लेकिन जुझारू मुरलीधरन ने जब संन्‍यास लिया तो न तो क्रिकेट जीता और नहीं खिलाडी हारा। बल्कि मुकाबला बराबरी पर रहा।

विदाई या आधुनिक भाषा में कहे फेयरवेल। एक ऐसा मौका होता है जब विदा होते व्‍यक्ति की स्‍मृतियों में ताउम्र ताजा रहे ऐसा गिफ्ट दिया जाता है। मुरली ने यह तोहफा 800 विकेट के रूप में खुद ही चुन लिया। इसके साथ ही भारत के खिलाफ जीत हासिल कर उन्‍होंने उल्‍टा अपनी टीम को रिटर्न गिफ्ट ही दिया। हर दिल अजीज और टीम में सबसे लोकप्रिय मुरलीधरन की कमी श्रीलंकाई क्रिकेट को हर वक्‍त खलेगी। मुरली जैसे खिलाडी सदियों में जन्‍म लेते है। मुरली जैसा कोई नहीं। अलविदा मुरली।