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Saturday, July 24, 2010

एम बोले तो मुरलीधरन

मैं कर सकता हूं नहीं यह मेरा घमंड नहीं विश्‍वास है। विश्‍वास और घमंड में बहुत  कम फर्क है। मैं कर सकता हूं, यह मेरा विश्‍वास है। सिर्फ मैं ही कर सकता हूं यह मेरा घमंड है।
गजनी फिल्‍म के हैविवेट सुपररिच मालिक संजय सिंघानिया का यह डॉयलाग श्रीलंका के जादुई गेंदबाज मुथैया मुरलीधरन पर सौ फीसदी खरा उतरा है। 18 साल का लंबा टेस्‍ट कैरियर 800 विकेट की बुलंदियों को केवल इसी थीम पर छू पाया कि मैं कर सकता हूं यह मेरा विश्‍वास है। आत्‍मविश्‍वास, चुनौतियों से निपटना, खुद के सामने बडा लक्ष्‍य रख उसे हासिल करना और टीम भावना जैसे शब्‍दों से जादुई ऑफ स्पिनर मुथैया मुरलीधरन के कैरियर का खाका खींचा जा सकता है। उनका खेल कैरियर मनोबल बढाने वाली किताब को पढने जैसा है।


बिस्किट बनाने वाले परिवार में जन्‍में मुरलीधरन कभी यह मुकाम पाएंगे किसी ने ख्‍वाब में भी नहीं सोचा होगा। मुरली को बचपन से ही यह अच्‍छे से मालूम था कि बिस्किट तभी कुरकुरा और स्‍वादिष्‍ट तैयार होता है जब वह भट्टी की तेज आंच में तपकर निकलें। बॉलिंग एक्‍शन और शुरूआती असफलताओं के बाद आलोचकों की भट्टी में उनकी खूब सिकाई हुई। आलोचनाओं की आंच से डरे बगैर मुरली की गेंदबाजी निखरती गई।  बालिंग एक्‍शन पर सवाल उठाकर उनके कैरियर को खत्‍म करने की कोशिश भी की गई। मुरलीधरन हर चुनौती से अपनी चिर परिचित मुस्‍कान के साथ विजेता की तरह निकले। 18 साल बाद जब मुरलीधरन ने टेस्‍ट क्रिकेट को विदा कहां तो वह उस मुकाम पर खडे है जहां कोई भी गेंदबाज पहुंच नहीं पाया है।


मुरलीधरन के पास 800 विकेट के शिखर को छूने के लिए भारत के खिलाफ तीन टेस्‍ट मैचों की श्रृंखला थी। दुनिया के इस सर्वश्रेष्‍ठ गेंदबाज ने केवल एक टेस्‍ट के बाद संन्‍यास का ऐलान कर सबको चौंका दिया था, क्‍योंकि उन्‍हें खुद पर विश्‍वास था कि वह एक ही टेस्‍ट में आठ विकेट लेने का माद्दा रखते है। वह भी दुनिया की सर्वेश्रेष्‍ठ बैटिंग लाइन के खिलाफ जिसमें मास्‍टर ब्‍लास्‍टर सचिन तेंदुलकर, द वॉल राहुल द्रविड, नजफगढ का सुल्‍तान वीरेन्‍द्र सहवाग और वेरी वेरी स्‍पेशल लक्ष्‍मण हो। मुरलीधरन ने अपने पूरे कैरियर में खुद के सामने मुश्किल लक्ष्‍य रखे है और उन्‍हें हासिल करने का जज्‍बां भी दिखाया है। यही वजह है कि इस ग्रह पर 800 टेस्‍ट विकेट लेने वाले वह पहले मानव बन गए।


मुरलीधरन केवल श्रीलंका में नहीं भारत में भी खासे लोकप्रिय है। दोनों मुल्‍कों के बीच रिश्‍तें त्रेता युग से रहे है। 20 वीं शताब्‍दी में रेडियो सिलोन और फिर लिट्टे के खिलाफ भारतीय शांति सेना के अभियान ने दोनों देशों को फिर जोडा। राजीव गांधी की हत्‍या के बाद श्रीलंकाई तमिलों के खिलाफ नाराजगी भी हुई, लेकिन 21 वी सदी में श्रीलंकाई तमिल खिलाडी मुथैया मुरलीधरन भारत में सबसे चहेते विदेशी क्रिकेटर हो गए। चेन्‍नई सुपर किंग्‍स के लिए खेलने वाले इस खिलाडी ने रेडियो सिलोन जैसी ही लोकप्रियता भारत में हासिल की। यही वजह है कि भारतीय क्रिकेट प्रेमी चाहते थे कि मुरली 800 विकेट हासिल करें लेकिन ख्‍वाहिश बस इतनी सी थी कि टेस्‍ट में भारत को हार का मुंह न देखना पडे।


दुनिया में सबसे ज्‍यादा टेस्ट और वन डे रन बनाने वाले मास्‍टर ब्‍लास्‍टर सचिन तेंदुलकर की तरह मुरलीधरन भी तेज गेंदबाज बनना चाहते थे। सचिन ने गेंद छोड़ बल्‍ला थामा तो मुरलीधरन ने गति को छोड़कर फिरकी को अपनाया। दोनों का यह निर्णय रिकार्ड बुक के वजन को बढाने वाला सा‍बित हुआ। खास बात यह है कि मुरली का इंटरनेशनल कैरियर में आगाज धमाकेदार नहीं हुआ था। इसके बाद भी मुरली ने हिम्‍मत नहीं हारी। कड़ी मेहनत और लड़ाकू क्षमता की बदौलत वह बरसों से श्रीलंका टीम के आधारस्‍तंभ बने रहें। मुरली केवल एक अच्‍छे क्रिकेटर नहीं बल्कि इंसान भी है। सुनामी ने जब श्रीलंका को बर्बाद कर दिया था उस वक्‍त उन्‍होंने सुनामी पीडितों के पुनर्वास में खासा काम किया था। श्रीलंकाई क्रिकेट प्रेमी मुरली को उसी तरह से पूजता है जिस तरह भारत में सचिन तेंदुलकर को भगवान माना जाता है। 


क्रिकेट की दुनिया में अब तक की सबसे यादगार विदाई मुरलीधरन की ही रही है। डॉन ब्रैडमेन अपनी आखरी पारी में चार रन बनाने से चूक गए थे तो लिटिल मास्‍टर सुनील गावस्‍कर भी आखरी पारी में चार रनों से शतक से चूक गए थे। मुरली इन सबसे परे अपने टेस्‍ट कैरियर की आखरी गेंद पर न केवल विकेट लेने में कामयाब रहे बल्कि उन्‍होंने अपनी टीम को जीत दिलाने में भी अहम रोल अदा किया। कहां ये जाता है कि खेल और खिलाडी के मुकाबले में अंत में जीत खेल की ही होती है लेकिन जुझारू मुरलीधरन ने जब संन्‍यास लिया तो न तो क्रिकेट जीता और नहीं खिलाडी हारा। बल्कि मुकाबला बराबरी पर रहा।

विदाई या आधुनिक भाषा में कहे फेयरवेल। एक ऐसा मौका होता है जब विदा होते व्‍यक्ति की स्‍मृतियों में ताउम्र ताजा रहे ऐसा गिफ्ट दिया जाता है। मुरली ने यह तोहफा 800 विकेट के रूप में खुद ही चुन लिया। इसके साथ ही भारत के खिलाफ जीत हासिल कर उन्‍होंने उल्‍टा अपनी टीम को रिटर्न गिफ्ट ही दिया। हर दिल अजीज और टीम में सबसे लोकप्रिय मुरलीधरन की कमी श्रीलंकाई क्रिकेट को हर वक्‍त खलेगी। मुरली जैसे खिलाडी सदियों में जन्‍म लेते है। मुरली जैसा कोई नहीं। अलविदा मुरली।

Monday, July 19, 2010

टेस्‍ट ऑफ हैदराबादी

भारतीय इतिहास में 17 मार्च की तारीख का कोई खास महत्‍व नहीं रहा है। इतिहास के जानकारों के लिए भी यह तारीख कोई खास मायने नहीं रखती, लेकिन यह तारीख पडोसी मुल्‍क और दुनिया की नयी आर्थिक महाशक्ति बनकर अमेरिका को चुनौती दे रहा चीन कभी भूल नहीं सकता है। तिब्‍बत में 1959 में मार्च की 17 तारीख को ही चीनी शासन के खिलाफ विद्रोह की चिंगारी उठी थी। इसी दिन दलाई लामा ल्‍हासा छोडकर भारत की सरजमी पर पहुंचे थे। 21 वी सदी में भी चीनी चुनौती को 17 मार्च की तारीख करारा जवाब दे रही है। यह चुनौती आर्थिक, सामरिक या राजनीतिक मोर्चे पर नहीं है बल्कि उस मोर्चे पर है जिस पर अब तक चीन का एकछत्र राज रहा है। यह मोर्चा है बैडमिंटन कोर्ट का जहां दुनिया की कोई भी ताकत उसके दबदबे को खत्‍म नहीं कर पाई है। चीन की दीवार को पहली बार जबर्दस्‍त सेंधमारी की है 17 मार्च को जन्‍मी साइना नेहवाल ने। चीनी रूतबे को पूरी तरह से तोडने से यह हैदराबादी बाला महज एक कदम दूर है।


बिरयानी के लिए मशहूर हैदराबादी खाना बेहद लजीज होता है। कुछ ऐसा ही लाजवाब खेल है 20 साल की साइना नेहवाल का। दुनिया में भारतीय खाने को मशहूर करने में लजीज हैदराबादी व्‍यंजन अहम रहे है, जबकि दुनिया में सबसे ज्‍यादा चाइनीज फूड खाया जाता है। टेस्‍ट ऑफ हैदराबादी ने इन दिनों चीनियों के मुहं का स्‍वाद बिगाडा हुआ है। हैदराबादी डिश जितनी नफासत से बनाई जाती है उतने ही करीने से साइना नेहवाल के खेल को सजा संवरा हुआ है। मंद आंच पर पकाए स्‍वादिष्‍ट भोजन की तरह साइना ने भी सफलता का स्‍वाद कदम दर कदम लेकिन मजबूत बुनियाद पर खडे होकर चखा है। 


हैदराबाद दक्षिण भारत का सबसे बडे शहरों में शुमार है। ग्रेटर हैदराबाद को मंजूरी मिलने के बाद तो यह दिल्‍ली के बाद क्षेत्रफल के लिहाज से देश का दूसरा सबसे बडा शहर बन गया है। पचास लाख से ज्‍यादा आबादी वाले शहर का साइना भी 12 साल पहले हिस्‍सा बन गई थी।  लाखों लोगों की भीड में खोने की बजाए साइना यहां अपनी अलग पहचान बनाने आई थी। यह शहर 15 वीं शताब्‍दी के आसपास अस्तित्‍व में आया था उस वक्‍त इसकी पहचान भाग्‍य नगर के रूप में थी। साइना के लिए भी यह शहर भाग्‍य नगर साबित हुआ। वैज्ञानिक पिता के साथ आठ साल की उम्र में हरियाणा के हिसार से हैदराबाद आई साइना की इस शहर ने पूरी जिंदगी ही बदल गई। इस उम्र में जब बच्चियां घर घर खेलती है, साइना 25 किलोमीटर का सफर केवल बैडमिंटन एकेडमी तक पहुंचने के लिए करती थी। वह 24 घंटे के दिन का कभी भी न खत्‍म होने वाला दौर था। इसी प्रेक्टिस की वजह है कि आज सफलता अर्जित करने का दौर भी कभी न रूकने वाला साबित हो रहा है।



बीस साल की साइना शाहरूख खान की जबर्दस्‍त फैन है। शाहरूख का बॉलीवुड का सफर और साइना की जिंदगी का सफर लगभग साथ साथ ही शुरू हुआ है। दोनों ने ही मेहनत और खुद पर आत्‍मविश्‍वास के दम में सफलता हासिल की। हालांकि साइना को अपने पसंदीदा हीरो की तरह हारकर जीतने वाला बाजीगर वाला तमगा पसंद नहीं है। वह जब कोर्ट में होती है तो जीत ही उसका एकमेव लक्ष्‍य होता है। आक्रमक खेल खेलकर वह विरोधी पर हावी हो जाती है। विरोधी समझ पाता इसके पहले साइना अपनी चिर परिचित मुस्‍कान लिए मैच जीतकर हैंड शेक करने नेट पर पहुंच जाती है। यदि विरोधी टक्‍कर दे फिर भी दमखम से वह शिकस्‍त देने का माद्दा रखती है।


खेल प्रेमी उनसे ओलम्पिक और वर्ल्‍ड चैम्पियनशिप में मेडल सहित उम्‍मीदों की लंबी फेहरिस्‍त लिए हुए है। इन सबके बीच खेल प्रेमी का ध्‍यान साइना के खातें में दर्ज एक बडी उपलब्धि पर नहीं जाता। आईपीएल में साइना को डेक्‍कन चार्जेस की टीम ने अपना ब्रांड एम्‍बेसेडर बनाया। दूसरी टीमों ने कैटरीना कैफ, शिल्‍पा शेट्टी, दीपिका पादुकोण जैसी हसीन बॉलीवुड तारिकाओं को यह जवाबदारी सौपी थी, लेकिन वेरी वेरी स्‍पेशल लक्ष्‍मण वाली टीम का चेहरा यह बैंडमिंटन खिलाडी बनी। क्रिकेट को धर्म और बॉलीवुड अदाकारा को अपना सब कुछ मानने वाले इस देश में साइना के लिए इससे बडी उपलब्धि और क्‍या हो सकती है। 



पूरे देश में मॉनसून सक्रिय है और साइना ने आसमां से बरस रही नेमत के बीच दुनिया में नंबर दो की पोजीशन हासिल की है। साइना का खेल भी बारिश की रिमझिम फुहारों सा है जिसका पानी जमीन में रिसकर धरती की आत्‍मा को तृप्‍त करता है। बारिश के साथ हर किसी के जीवन की सुखद यादे जुडी होती है, उम्‍मीद की जाना चाहिए की साइना के जीवन में यह मॉनसून उपलब्‍धियों की बारिश करें। आमीन।

Wednesday, July 14, 2010

द अलकेमिस्‍ट

ब्राजील के जाने माने लेखक पाओलो कोएले की मशूहर कृति है द अलकेमिस्‍ट। इस उपन्‍यास का मुख्‍य किरदार है स्‍पेन के दूरस्‍थ अंचल का गडरिया सेंटियागो है। यह एक ऐसे गड‍रिये की कहानी है जो मुश्किलों को फुटबॉल की तरह ठोकर मारकर दुनिया फतह करने निकला है। द अलकेमिस्‍ट के सेंटियागो की कहानी परी कथा सी लगती है। कहानी होने के बावजूद वह जिंदगी के करीब होते हुए असली सी लगती है। सेंटियागो के मुल्‍क स्‍पेन की वर्ल्‍ड कप फुटबॉल में सफलता भी इस गडरिये से मिलती जुलती है। स्‍पेन की टीम उस घमासान में विजयी हुई है जिस पर छह अरब लोगों की निगाहें लगी हुई थी और 214 मुल्‍क इसे पाने की होड में शामिल थे। आकंडों की कुछ ऐसी जादूगरी द अलकेमिस्‍ट के साथ भी जुडी है। 55 भाषाओं में किताब का अनुवाद किया । 150 से ज्‍यादा देशों में इस किताब ने बिक्री के नये रिकार्ड रचे और गिनीज बुक ऑफ वर्ल्‍ड रिकार्ड में जगह पाई।


स्‍पेन की वर्ल्‍ड कप यात्रा भी द अलकेमिस्‍ट को पढने और इस किताब के वर्ल्‍ड रिकॉर्ड बनाने की यात्रा जैसे ही है। यह किताब 1988 में पहली बार पुर्तगाली भाषा में सामने आई थी। इसी के बाद धीरे धीरे यह किताब पूरी दुनिया पर छा गई थी। सेंटियागो के दुनिया में सामने आने के 22 साल बाद स्‍पेन ने ठोकर से दुनिया को फतह की उसकी कडी भी पुतर्गाल से जुडती थी। पडोसी मुल्‍क के‍ खिलाफ प्री क्‍वार्टर फायनल में 1-0 से मिली जीत के बाद ही स्‍पेन को खिताब के दावेदारों में शुमार किया गया। सेंटियागो की तरह इस वर्ल्‍ड कप में स्‍पेन ने तमाम विपरीत हालात होने के बावजूद हौंसला नहीं खोया। यह टीम एक एक कर सारी बाधाओं दूर करती चली गई। बिलकुल ही कुछ ऐसा जैसे द अलकेमिस्‍ट के हाथ में आने के बाद सारी बाधाओं को दूर कर उसे एक बार में ही पूरा पढ डालने का मन करता है। यह यूरोपीयन टीम शुरूआती झटके के बाद यह टीम खिताब की दौड में टॉप गियर में दौडने लगी थी।

द अलकेमिस्‍ट में पाओलो कोएले लिखते है कि हमें अपने दिमाग से नकारात्मक विचारों की सफाई करते रहना चाहिए। स्‍पेन ने भी वर्ल्‍ड कप में भी यही किया। स्विट्जरलैंड के खिलाफ वर्ल्‍ड कप के अपने पहले ही मुकाबले में स्‍पेन को हार का मुंह देखना पडा था। स्‍पेन की हार को वर्ल्‍ड कप का सबसे बडा उलेटफेर बताया गया। इसके साथ ही फुटबॉल के स्‍वयंभू जानकारों ने वर्ल्‍ड कप से स्‍पेन की छुट्टी लगभग तय कर दी थी। स्‍पेनिश टीम ने ऐसे मोड पर हार के नकारात्‍मक विचारों को पीछे छोड जोरदार तरीके से वापसी की। पहले होंडूरास को शिकस्‍त देकर उम्‍मीदें कायम की और फिर चिली की चुनौती को एक जोरदार मुकाबले में शिकस्‍त देकर इस टीम ने नॉक आउट दौर में अपनी जगह बनाई थी।

सेंटियागो के माध्‍यम से किताब यह संदेश भी देती है जब तकदीर हमारा साथ दे रही हो तो हमें उसका फायदा उठाना चाहिए। हमें भी उसकी उतनी ही मदद करनी चाहिए , जितनी वह हमारी कर रहा है। स्‍पेन की खिताबी जीत में भी इसी संदेश के पीछे छुपी हुई है। इस वर्ल्‍ड कप में पांच बार की चैंपियन ब्राजील और अर्जेंटीना को खिताब का सशक्‍त दावेदार माना जा रहा था। माइकल बलाक की गैरमौजूदगी के बावजूद पहले मुका‍बले में धमाकेदार खेल के बाद जर्मनी की चुनौती को भी गंभीरता से लिया जा रहा था। इन सबके बीच यूरो कप चैंपियन स्‍पेन का दावा थोडा कमजोर नजर आ रहा था। स्‍पेन पर किस्‍मत की ऐसी मेहरबानी रही कि इन तीनों टीमें उसके आडे आए बगैर ही घर लौट गई। वर्ल्‍ड कप 2010 की चैंपियन इस टीम ने तकदीर की मेहरबानी में अपनी मेहनत जोडकर वह कर दिखाया जो अब तक वर्ल्‍ड कप फुटबॉल के इतिहास में नहीं हुआ।

यह वर्ल्‍ड कप मैसी, काका, रोनाल्‍डो और रूनी जैसे बडे खिलाडियों की चमक के साथ शुरू हुआ था। इनकी चकाचौंध के आगे बाकी किसी खिलाडियों पर खेल प्रेमी की न तो निगाहें थी और नहीं उम्‍मीदें जुडी हुई थी। स्‍पेन के खिलाडियों में डेविड विला ही खेल प्रेमियों की फेवरेट लिस्‍ट में शामिल था। बाकी खिलाडियों को बडे बडे दिग्‍गजों की मौजूदगी के चलते नजरअंदाज कर दिया गया था। यहां द अलकेमिस्‍ट के सेंटियागो की बात फिर की जाए तो पता चलता है कि उसकी खुशी का राज़ यह है कि दुनिया की तमाम चमकती चीजों को देखें ज़रूर , लेकिन अपने पास मौजूद चीजों को न भूलें। स्‍पेन भी इन नामी खिलाडियों की चकाचौंध में अपने उम्‍मीद के दिए को जलाए रखा। बजाए दुश्‍मन की ताकत से डरने से अपने हथियारों की धार को यह टीम पैना करती गई। जैसे जैसे द अलकेमिस्‍ट एक मुल्‍क से दूसरे मुल्‍क पहुंची उसकी लोकप्रियता उतनी ही तेजी से बढती गई। स्‍पेन का विजयी रथ भी पुतर्गाल से आगे बढा उसके साथ ही खिताब की दावेदारों में इस टीम का ग्राफ बढता ही गया।

80 साल से स्‍पेन के खिताब का सूखा खत्‍म हुआ तो अंत में भी सेंटियागो की तरह ही रहा। उपन्‍यास के अंत में सेंटियागो को अपने कदमों तले खजाना मिलता है। स्‍पेन को भी जोहांसबर्ग के सॉकर सिटी में पांव से ही सोना हासिल हुआ। आंद्रेस इनिस्ता के लेफ्ट फुटर ने 116 मिनिट में स्‍पेन के इस ख्‍वाब को सच कर दिया जो हर चार साल में टूट कर बिखर जाता था। 13 वर्ल्‍ड कप में शामिल होने के बाद स्‍पेनिश खिलाडी वर्ल्‍ड कप की ट्राफी को चूमने में कामयाब रहे। सेंटियागो पूरी दुनिया का चहेता है और वर्ल्‍ड कप चैंपियन बनने के बाद स्‍पेन भी।

Thursday, July 8, 2010

मैं नहीं हूं ना

मैं हूं ना फिल्‍म के हीरो शाहरूख खान के पास हर मर्ज की दवा होती है। फिल्‍म के हीरोइन की जान बचाना हो या फिर सुष्मिता सेन को इजहार ए मोहब्‍बत करना हो या फिर गुल हुई बत्‍ती की खामी को दूर करना हो। मैं हूं ना कहते हुए शाहरूख खान उस मास्‍टर चाबी की तरह हर जगह पर मौजूद रहते है जो मुसीबतों के ताले को खोल राह को आसान करती है। पिछले तीन वर्ल्ड कप से फ्रांस के लिए शाहरूख खान की भूमिका जिनेदिन जिडान निभा रहे थे। टीम की जरूरत के मुताबिक जिदान हर पोजीशन पर नजर आते थे। टीम की हर छोटी बडी दिक्‍कतों को यह जादूगर चुटकी में सुलझा देता था। फुटबॉल की भाषा में इस मैं हूं ना वाली भूमिका को प्‍ले मेकर कहां जाता है। वर्ल्‍ड कप में गत उपविजेता फ्रांस को प्‍ले मेकर ही भूमिका खली थी जो टीम को एक सूत्र में बांधकर रख सके और हर मुसीबत के वक्‍त कह सके कि मैं हूं ना।

मुख्‍य अभिनेता की गैरमौजूदगी की वजह से सहायक अभिनेताओं के भरोसे अफ्रीका पहुंची फ्रांस की टीम को फुटबॉल के बाक्‍स ऑफिस पर पहले से ही कमजोर आंका जा रहा था। कुछ नयी कुछ पुरानी रील को जोडकर तैयार की गई फिल्‍म की तरह इस टीम में जोडतोड साफ तौर नजर आ रही थी। यही वजह है कि इस टीम में एकजुटता और जीत के जस्‍बें का अभाव साफ झलक रहा था। इस पर कलाकारों के खुद को दूसरे से बेहतर साबित करने की होड मची हो और कमजोर एडिटिंग होतो फिल्‍म में बिखराव नजर आता है, कुछ ऐसा ही बिखराव व्‍यक्तिगत खेल खेलने की वजह से फ्रांस की टीम में भी नजर आ रहा था।

दरअसल, किसी भी फिल्‍म के लिए अब पहले तीन दिन बेहद महत्‍वपूर्ण होते है। आजकल इन तीन दिनों में फिल्‍म हाउसफुल हुई की उसे हिट मान लिया जाता है। फ्रांस की टीम वर्ल्‍ड कप के बॉक्‍स ऑफिस पर ओपनिंग होते ही दम तोड दिया। उरूग्‍वे के खिलाफ फर्स्‍ट डे फर्स्‍ट शो ने ही इस टीम पर फ्लॉप का ठप्‍पा लगा दिया था। पहले दिन जिस फिल्‍म ने पानी नहीं मांगा उसके दूसरे सप्‍ताह में प्रवेश करने की उम्‍मीद करना भी बेमानी माना जाता है। बावजूद इसके वितरकों को शनिवार और रविवार को वीक एंड पर फिल्‍म के रिवाइवल की उम्‍मीद बंधी रहती है वैसी ही उम्‍मीद बाकी दो मुकाबलों में गत उपविजेता टीम के समर्थकों को थी। फ्रांसीसी कलाकारों की लचर अदाकारी की वजह से फिल्‍म पिट गई और दूसरे दौर के पहले ही मार्केट से बाहर हो गई।

बडे बैनर कभी फिल्‍म की सफलता का पैमाना नहीं होता। बडा बैनर और नये कलाकार कई बार फ्लॉप फिल्‍म का फार्मूला बन जाते है। कुछ ऐसा ही फ्रांसीसी टीम के साथ हुआ। आपसी विवाद और विवादास्‍पद तरीके से आयरलैंड के खिलाफ प्‍ले ऑफ मुका‍बले में थियरे हेनरी के हेंडगोल यानि की हाथ से किए गोल की वजह से अंतिम दौर में फ्रांस की टीम वर्ल्‍ड कप का टिकिट कटा पाई थी। वितरक नहीं मिलने की वजह से जिस तरह फिल्‍म रिलीज होने में देरी हो जाती है उसी तरह फ्रांस की टीम ने किसी तरह गिरते पडते वर्ल्‍ड कप के क्‍वालिफाई किया था। फिल्‍म को रिलीज के लिए अंतिम समय तक संघर्ष करना पडे उससे सफलता की उम्‍मीद भी क्‍या की जा सकती है।

बाक्‍स ऑफिस पर जब कोई फिल्‍म रिलीज होती है तो सफलता का पैमान जीरो से शुरू होता है। पुरानी सफल असफल‍ फिल्‍मों का खाता जीरो हो जाता है। फिल्‍मों की तरह फुटबॉल में भी इतिहास का सेविंग अकाउंट काम नहीं आता है। मैं हूं ना वाले शाहरूख खान जब डॉन बने तो 11 मुल्‍कों की पुलिस को उनका नहीं बल्कि उन्‍हें दर्शकों का इंतजार करना पडा। पिछले तीन वर्ल्‍ड कप में फ्रांस ने एक बार खिताब पर कब्‍जा जमाया था तो पिछली बार वह खिताब से एक कदम दूर रह गया था, लेकिन दक्षिण अफ्रीका में यह गौरवशाली इतिहास किसी काम नहीं आया। फुटबॉल के सुपरहिट मुकाबले में यह टीम सुपर फ्लाप हुई क्‍योंकि मैं नहीं हूं ना।

Saturday, June 12, 2010

वाका, वाका, वाका..........

वाका वाका वाका, क्रिकेट प्रेमियों के लिए वाका के मायने तेज गेंदबाजों की सनसनाती गेंदों पर डर के मारे थिरकते बल्‍लेबाजों का नजारा होता है। आस्‍ट्रेलिया के पर्थ की यह पिच तेज गेंदबाजों के लिए स्‍वर्ग मानी जाती है। वाका की पिच बल्‍लेबाज तो कई दशकों से खौफ के साथ थिरकने को मजबूर करती रही है लेकिन वाका  धुन पर अब सारी दुनिया थिरक रही है। वह भी डर को पीछे छोड मस्‍ती और उत्‍सव के रंगारंग माहौल में। दरअसल, इस वाका का क्रिकेट से कोई वास्‍ता नहीं है बल्कि इसका मंच दक्षिण अफ्रीका है और मौका है वर्ल्‍ड कप फुटबॉल के 19 वें संस्‍करण का। चार साल बाद शकीरा एक बार फिर फुटबॉल मैदान पर थी और उद्घाटन समारोह को रंगीन बना गई। बैकहम के फ्री किक पर जिस तरह फुटबॉल लचक खाती हुई गोल पोस्‍ट में दाखिल हो जाती है कुछ इसी तरह शकीरा अपनी अदाओं से अरबों फुटबॉल प्रेमियों के दिलों में एक बार फिर दाखिल हो गई। वाका वाका गीत से शकीरा ने दुनिया की सबसे बडी इवेंट का हॉट ओपनिंग किया है।


उद्घाटन समारोह में शकीरा ने रंग जमाया तो उद्घाटन मुकाबले में दक्षिणी अफ्रीकी स्‍ट्राईकर ने गोल जमाने के बाद अपने जश्‍न से सबका ध्‍यान अपनी और खींच लिया। फुटबॉल के मैदान पर गोल करने के बाद या जीत दर्ज करने के बाद फुटबॉल खिलाडी जश्‍न करने का हर बार नया तरीका ढूंढ लेते है। शाबालाला इस कडी में जुडने वाला एक और नाम हो गया। शाबालाला की ठोंकर से 55 वें मिनिट में हुए गोल के बाद मेजबान टीम ने इतिहास रचने की और कदम बढा दिए थे। मुकाबले के 11 मिनिट पहले बढते अफ्रीकी कदमों पर राफेल मारक्‍वेज के शॉट ने ब्रेक लगा दिए। दक्षिण अफ्रीका का डिफेंस थोडा सुस्‍त हुआ और स्‍कोर बराबर हो गया।


वर्ल्‍ड कप में पांचवी बार उद्घाटन मुकाबल खेल रही मेक्सिको की टीम का पलडा पूरे समय भारी रहा। अधिकांश समय गेंद दक्षिण अफ्रीकी हॉफ में ही रही है लेकिन मौकों की को भुनाने में नाकामी ने मेक्सिको को जीत से दूर कर दिया। मेक्सिको की किस्‍मत ने यदि अंतिम पलों में उसका साथ छोड दिया होता तो दक्षिण अफ्रीका में जो जश्‍न मनता वह वर्ल्‍ड कप जीतने से कम नहीं होता। मेजबान टीम के कैटलेगो एमफेला का शॉट गोल पोस्‍ट टकरा गया। मेक्सिको के ही नहीं अफ्रीका के भी करोडों दर्शकों की सांसे जरूर उस वक्‍त रूक गई होगी जब एमफेला के टच के बाद गेंद गोल पोस्‍ट की और बढ रही थी। गोल पोस्‍ट से टकराने के बाद गेंद गोल पोस्‍ट को चूमने की बजाए किसी रूठे हुए महबूब दूर हो गई और इसके साथ ही दक्षिणी अफ्रीका का जीत से आगाज करने का ख्‍वाब भी टूट गया।

दक्षिण अफ्रीका वर्ल्‍ड कप के उद्घाटन मुकाबले में उतरने वाली तीसरी अफ्रीकी टीम है। दक्षिण अफ्रीका को छोडकर बाकी दोनों टीमों ने जीत के साथ आगाज किया था। दोनों टीमों ने गत विजेता टीम को हराकर सनसनी मचा दी थी। 1990 में मेराडोना की टीम को जीत का प्रबल दावेदार माना जा रहा था लेकिन अफ्रीकी टीम ने शून्‍य के मुकाबले एक गोल से गत विजेता टीम को शिकस्‍त दी थी। हालांकि यह मेराडोना का जादू था जिसने चलते अर्जेटीना इस सदमे से उबरते हुए फायनल तक पहुंच सकी। हालांकि जिनेडिन जिदान की टीम इतनी खुशकिस्‍मत नहीं रही। गत विजेता होने की वजह से 2002 वर्ल्‍ड कप में फ्रांस को खिताब का प्रबल दावेदार माना जा रहा था। जिदान की इस टीम को शुरूआती मुकाबले में ही अफ्रीकी टीम सेनेगल से हार का मुंह देखना पडा। इसके बाद फ्रांस की बुरी गत हुई थी। दक्षिण अफ्रीका ने बिलकुल ही अलग शुरूआत की है ऐसे में यह देखना दिलचस्‍प होगा कि वर्ल्‍ड कप में इस टीम का सफर क्‍या मुकाम तय करता है।

हालांकि, उद्घाटन मुकाबला उतना रंग नहीं जमा पाया जितनी उम्‍मीद फुटबॉल प्रेमियों को थी। एक महीने तक चलने वाला यह आयोजन जैसे जैसे आगे बढेगा ठोंकर से दुनिया को फतह करने की कश्‍मकश उतनी ही तेज होती जाएगी। गेंद को लेकर संघर्ष जितना बढेगा उतनी ही तेज फुटबॉल प्रेमियों की धडकने होंगी। फुटबॉल की दुनिया के कई बडे सितारे खुद को साबित करने के लिए तैयार है तो कई ऐसे खिलाडी भी है जो इस मंच पर अपने खेल का जौहर दिखाकर पूरी दुनिया पर छा जाने के लिए बेताब है। भारत में मॉनसून ने आमद भले दी हो लेकिन यकीन मानिए फुटबॉल का यह फीवर दिनों दिनों बढता ही जाएगा और बारिश की बूंदों के साथ साथ फुटबॉल का सतरंगी संसार अपनी अलग ही छटा बिखरेगा। मौसम और फुटबॉल का मुकाबला कभी भी रंग बदल सकता है। इसलिए बेवक्‍त की बारिश के लिए छाते के साथ साथ उलेटफेर से भरे नतीजों के लिए दिल को झटके से बचाने की तैयारी भी कर लीजिए।

Sunday, April 25, 2010

कैरेबियन आंधी

मुंबई इंडियंस और बेंगलुरू रॉयल चैलेंजर्स के खिलाफ डीवाय पाटिल स्‍टेडियम पर सेमीफायनल मुकाबला शुरू होने में ही था। मुकाबले को लेकर बेसब्री थी ही और मुंबई के पहले बल्‍लेबाजी करने की वजह से उत्‍सुकता जरा ज्‍यादा ही थी। मेरा सारा ध्‍यान मुकाबले की और था और उसी वक्‍त छोटे शहर से भोपाल में कुछ बडा करने की तमन्‍ना लिए आए एक मीडिया साथी दुखी था अपने संस्‍थान में हुए बदलाव से। सहानुभूति भरे मेरे लफ्जों का उस पर कोई खास असर नहीं पड रहा था। जो काम मैं नहीं कर सका वह टाटा शहर जमशेदपुर के फौलादी इरादों वाले सौरभ तिवारी ने कर दिखाया। आईपीएल के पहले गुमनाम सौरभ तिवारी ने आईपीएल के सेमीफायनल जैसे बडे मौके मुश्किल हालातों में एक जबर्दस्‍त पारी खेली। छोटे शहर से आए तिवारी ने जिस तरह से दुनिया के मंच अपना नाम रोशन किया। तिवारी की इस पारी ने केवल मुंबई को नहीं बल्कि विपरीत हालत झेल रहे मीडिया साथी को उनकी सफलता ने अवसाद से उबार दिया।
डीवाय पाटिल स्‍टेडियम पर सचिन तेंदुलकर ने डेल स्‍टेन की गेंद पर दो चौके जमाकर जोरदार आगाज किया। स्‍टेडियम सचिन सचिन के शोर से गुंज रहा था। क्रिकेट प्रेमियों को सचिन से फिर एक बडी पारी की उम्‍मीद जगी लेकिन स्‍टेन ने सचिन को आउट कर मुंबई की उम्‍मीदों को करारा झटका दिया। मुंबई के लिए फायनल  एक तरह से दूर होता दिखने लगा। सौरभ तिवारी ने ऐसे मौके पर मोर्चा संभाला जब स्‍टेडियम पर सन्‍नाटा पसरा हुआ था। ऐसे विपरीत हालातों में मुंबई को मुसीबत से उबारा सौरभ तिवारी ने। दक्षिण भारतीय अंबाटी रायडू के साथ मिलकर इस उत्‍तर भारतीय बल्‍लेबाज ने मुंबईवासियों के दिल पर एक बार फिर राज किया। खासतौर पर सौरभ तिवारी ने इस आईपीएल में अपनी सर्वश्रेष्‍ठ पारी खेली। रायडू ने उनका बखूबी साथ दिया और बेंगलुरू के गेंदबाजी अटैक की इन दोनों के सामने एक भी नहीं चली।
सौरभ तिवारी की तरह आईपीएल के सबसे महंगे खिलाडी केरान पोलार्ड ने भी मानों बडे मुकाबलों के लिए अपने करिश्‍मे को बचाकर रखा था। लीग मुकाबलों में कोई खास प्रदर्शन नहीं करने की वजह से पोलार्ड सवालों के कटघरे में खडे थे। मुंबई इंडियंस के लिए वह एक महंगा और गलत सौदा साबित हो रहे थे। पोलार्ड ने बेंगलुरू के खिलाफ अपनी पारी से आलोचकों की बोलती बंद कर दी। डीवाय पाटिल स्‍टेडियम पर पोलार्ड जब बल्‍लेबाजी करने आए तो उमस भरी शाम थी और जब मुकाबला खत्‍म हुआ तो बेंगलुरू टीम के खिताब जीतने के ख्‍वाब कैरिबियन आंधी में उड गए। बल्‍लेबाजी के बाद गेंदबाजी में भी यह पोलार्ड का दिन था। बिग हिटर बल्‍लेबाज ने गेंदबाजी से तीन बडे हिटरों का शिकार किया। रॉबिन उत्‍थपा, विराट कोहली और मनीष पांडे तीनों को पोलार्ड ने आउट किया।

बेंगलुरू की बैटिंग लाइन के बडे नाम अपने ख्‍याति के हिसाब से परफार्म कर रहे थे। ऐसे में एक वक्‍त यह टीम अपराजेय लग रही थी। यही बैटिंग लाइन सीजन के अंत में आते आते बडे मुकाबलों में नाकाम साबित हुई। पोलार्ड के जादू के बावजूद ऐसा नहीं था कि बेंगलुरू की टीम इस मुकाबले को जीतन नहीं सकती थी। टूर्नामेंट की सबसे सशक्‍त बल्‍लेबाजी वाली इस टीम की बल्‍लेबाजी में काफी गहराई थी।  कैलिस, द्रविड और पीटरसन ने आगाज तो अच्‍छा किया था लेकिन इसके पहले कोई कमाल दिखा पाते उसके पहले पैवेलियन लौट गए। लगातार दूसरी बार बेंगलुरू की टीम खिताब के नजदीक पहुंच कर भी उसे हासिल नहीं कर पाई।

अनिल कुंबले अमूमन क्रिकेट के मैदान पर अपनी नाकामी या निराशा को जताते नहीं है। मुंबई के खिलाफ मुकाबले में अनिल कुंबले की निराशा साफतौर पर झलक रही थी। अनिल कुंबले इस आईपीएल के सबसे किफायती गेंदबाज साबित हुए है। सेमीफायनल के निर्णायक मौके पर टीम को उनसे उम्‍मीद थी लेकिन जंबो नाकाम रहे। अनुशासित गेंदबाजी करने वाले अनिल कुंबले ने नो बॉल भी की और अहम मौके पर बल्‍लेबाजों को आजादी से रन बनाने का मौका भी उन्‍होंने दे दिया। कुंबले अपने व्‍यक्तिगत प्रदर्शन से तो निराश थे ही अंतिम ओवरों में बाकी गेंदबाजों भी बल्‍लेबाजों पर लगाम कसने में नाकाम रहे।
मुंबई के लिए फायनल में पहुंचने की खुशी के साथ एक बडा झटका भी इस मुकाबले से लगा है। मुंबई को पहली बार आईपीएल के फायनल में पहुंचाने वाले सचिन की अंगुली में चोट लग गई है। शुरूआती ओवर में ही सचिन चोट की वजह से मैदान के बाहर हो गए। सचिन को लेकर मुंबई टीम के साथ साथ उनके करोडों क्रिकेट प्रेमी भी इस चोट को लेकर चिंतित नजर आए। आईपीएल में सबसे ज्‍यादा रन बनाकर आरेंज कैप हासिल करने वाले सचिन की गैर मौजूदगी से मुंबई को करारा झटका लग सकता है। रविवार को छुट्टी का दिन आईपीएल का अंतिम दिन होने के साथ साथ सबसे बडा दिन भी है। इस बडे मुकाबले से सचिन की छुट्टी हुई तो फायनल से मुंबई की छुट्टी हो सकती है।

दादा दा जवाब नहीं

कोलकाता नाइटराइडर्स ने अपने मालिक शाहरूख खान को शर्मिन्‍दा होने से बचा लिया। शाहरूख खान ने ऐलान किया था कि यदि उनकी टीम आईपीएल का खिताब जीतेगी तो वह स्‍टेडियम में न्‍यूड होकर नाचेंगे। खिताब जीतना को दूर यह यह हाई प्रोफाइल टीम लगातार तीसरी बार सेमीफायनल में जगह बनाने में नाकाम रही। यह एकमात्र ऐसी टीम जो अब तक ऐसा करने में नाकाम रही है। दर्शकों की सबसे चहेती टीम और बॉलीवुड के किंग खान का नाम जुडा होने की वजह से हर बार इस टीम से उम्‍मीद काफी रहती है। हर बार की तरह इस बार भी शाहरूख की टीम ने निराश किया।

शाहरूख की टीम ने भले ही निराश किया हो लेकिन सीजन दो के विवादों के बाद एक बार फिर टीम की कमान संभालने वाले सौरव गांगुली एक बार फिर प्रिंस ऑफ कोलकाता साबित हुए। लीग के अंतिम मुकाबले में मुंबई के खिलाफ भी गांगुली का शानदार फार्म जारी रहा। 42 रनों की पारी के बाद वह आईपीएल में रन बनाने वाले खिलाडियों की फेहरिस्‍त में तीसरे नंबर पर जा पहुंचे है। 493 रन बनाने वाले गांगुली से रनों के मामले में जैक कैलिस और सचिन तेंदुलकर ही आगे है। गांगुली का इस सूची में आना उन आलोचकों को करारा जवाब है जो उन्‍हें चुका हुआ बता रहे थे। मजबूत इच्‍छाशक्ति की बदौलत ही गांगुली ने टीम इंडिया के साथ लंबा सफर तय किया है और आईपीएल में भी उन्‍होंने खुद को साबित कर दिया है। कप्‍तानी, फील्डिंग और बल्‍लेबाजी तीनों में गांगुली का कोई जवाब नहीं था। टीम के बाकी खिलाडियों की और से यदि सहयोग मिलता और कुछ अहम मुकाबलों में टीम घटिया खेल नहीं दिखाती तो कोई शक नहीं कि यह टीम खिताब की दौड में शामिल रहती। मुंबई के खिलाफ मुकाबले में कोलकाता को एक बडे अंतर से जीत दर्ज करना थी। कोलकाता यदि पहले बल्‍लेबाजी कर 175 रन बनाती तो उसे मुंबई को दो रनों पर ऑल आउट करना पडता। यह नामुमकिन ही था। 

दूसरी और सेमीफायनल में पहले से ही जगह बना चुकी मुंबई के लिए अंतिम लीग मुकाबला अपनी बैंच स्‍ट्रैंथ को परखने का एक अच्‍छा मौका साबित हुआ। सचिन तेंदुलकर सहित शीर्ष पांच खिलाडियों को आराम कर नये खिलाडियों की अगुआई में मुंबई टीम मैदान पर उतरी थी। रायडू और सौरभ तिवारी दोनों ने बेहतर खेल दिखाया लेकिन जिन नये खिलाडियों को मौका दिया वह कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाए। इस वजह से मुंबई बडा स्‍कोर खडा करने में नाकाम रही। टीम को सचिन के बगैर खेलने की आदत नहीं है। उनकी बल्‍लेबाजी से मुंबई का विजयी मार्च पर थी तो उनकी मौजूदगी नये खिलाडियों को कुछ अद्भुत करने प्रेरित करती थी। यह मुकाबला टीम ने उनके बगैर खेला और नतीजा सामने है।
आईपीएल के पहले सीजन में भी कोलकाता ने पहले दो मुकाबलों में डेक्‍कन चार्जर्स और बेंगलुरू रॉयल चैलेंजर्स को हराया था। इस बार भी कोलकाता की टीम ने सीजन की शुरूआत इन्‍हीं दोनों टीमों को शिकस्‍त देकर की थी। मुंबई के साथ इस टीम को संभावित विजेता के रूप में देखा जा रहा था। शुरूआती जीत के बाद कोलकाता की लय गडबडा गई। टीम की गेंदबाजी उसका कमजोर पक्ष रही। ईशांत शर्मा सबसे बडे मुजरिम के रूप में सामने आए है। क्रिस गैल और मेक्‍युलम जैसे बल्‍लेबाजों के प्रदर्शन में भी निरंतरता का अभाव रहा। मनोज तिवारी और मैथ्‍यूज भी कभी जमकर खेले तो कभी उन्‍होंने टीम को नीचा दिखाया।
आईपीएल के चौथे सीजन में टीमों में भारी बदलाव होंगे। शाहरूख खान की टीम को भी नये सिरे से खिलाडियों की खरीद फरोख्‍त में शामिल होना पडेगा। फिर भी एक बात तो तय है कि शाहरूख के लिए पहली पसंद प्रिंस ऑफ कोलकाता ही होंगे और दादा भी इस शहर के अलावा किसी और की नुमाइंदगी करना पसंद नहीं करेंगे। यह एक ऐसा शहर जिसके रगों में क्रिकेट और फुटबाल बसा हुआ है। अच्‍छा खेल दिखाने पर यहां के खेल प्रेमी आपको दाद देने में जरा सी भी कंजूसी नहीं करेंगे और यदि आपने निराश किया तो वे ईडन गार्डन को फूंकने से भी परहेज नहीं करेंगे। उम्‍मीद की जाना चाहिए की दादा की दादागिरी अगले सीजन में भी जारी रहेगी।