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Wednesday, August 11, 2010

ताज कोल्‍हापुरी

कोल्‍हापुर, कर्नाटक की सीमा से सटा महाराष्‍ट्र एक शहर। ठेठ मराठी संस्‍‍कृति का प्रतिनिधित्‍व करने वाला यह शहर किसी पहचान का मोहताज नहीं है। कोल्‍हापुर पर देवी महालक्ष्‍मी और विष्‍णु भगवान की कृपा मानी जाती है तो कहां यह भी जाता है देश में प्रति व्‍यक्ति सबसे ज्‍यादा मर्सिडीज कार इसी शहर में है। चटपटा मांसाहारी भोजन हो या फिर खास तरीके से तैयार की गई चप्‍पल, कोल्‍हापुर शहर से जुड़ी खासियतों की फेहरिस्‍त काफी लंबी है। देश के सबसे समृद्ध शहरों में शुमार इस शहर की पहचान में अब वर्ल्‍ड चैंपियन का ताज भी जुड गया है। विश्‍व शूटिंग चैंपियनशिप में स्‍वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला निशानेबाज तेजस्विनी सांवत भी इसी शहर की नुमाइंदगी करती है।


कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में भ्रष्‍टाचार और महिला खिलाडि़यों के यौन उत्‍पीड़न की वजह से देश में खेल और खिलाड़ी गलत वज़हों से सुर्खियों में बने हुए है। ऐसे में तेजस्विनी की कामयाबी ने खिलाडि़यों के मुरझाए चेहरों पर खुशियां लौटा दी है। इसके साथ ही तेजस्विनी मिसाल बन गई है कि किस तरह साधनों का अभाव और पारिवारिक दिक्‍कतों का मुकाबला कर भी दुनिया फतह की जा सकती है। तेजस्विनी न तो किसी समृद्ध परिवार से है और नही सफलता का रास्‍ता उसके लिए आसान रहा है। इसके बावजूद इस कोल्‍हापुरी बाला ने वह कारनामा कर दिखाया है जो अब तक कोई भी भारतीय महिला निशानेबाज नहीं कर पाई।


तेजस्विनी के शहर कोल्‍हापुर को सांस्‍कृतिक विरासत को सहेजने की वजह से कलापुर भी कहां जाता है। भारत की पहली फिल्‍म राजा हरीशचन्‍द्र की परिकल्‍पना यही रची गई थी। रील लाइफ का आगाज जहां हुआ वही कि तेजस्विनी की रियल लाइफ की कहानी भी फिल्‍मों की तरह उतार चढ़ाव भरी रही। फिल्‍म की किसी नायिका की तरह तेजस्विनी ने सफलता का स्‍वाद चखने के पहले वक्‍त के कई थपेड़े झेले है। कर्ज पर रायफल लेकर उन्‍होंने अभ्‍यास किया तो जब सफलता का वक्‍त आया तो 1971 की लड़ाई में भारतीय नेवी के हिस्‍सा रहे पिता रवीन्‍द्र सांवत नहीं रहे। हालात ने हर बार तेजस्विनी को तोड़ने की कोशिश की लेकिन बजाए शिकवे शिकायत करने के तेजस्विनी फिल्‍म की जाबांज पुलिस अधिकारी की तरह इस निशानेबाज ने हर चुनौती को करारा जवाब दिया।


तेजस्विनी के शहर यानि खेलों की राजधानी भी। खासतौर पर यहां कुश्‍ती और भारतीय खेलों को लेकर खासा क्रेज रहता है। ऐसे शहर में निशानेबाजी जैसे खेल को चुनना और फिर शीर्ष तक पहुंचना कड़ी तपस्‍या के बगैर संभव नहीं है। तीन बहनों में सबसे बड़ी तेजस्विनी को जिंदगी ने कई बार ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया जहां निशानेबाजी छोड़ने के अलावा कोई विकल्‍प उन्‍हें नजर नहीं आ रहा था। 13 साल की उम्र में एनसीसी शिविर से निशानेबाजी शुरू करने वाली तेजस्विनी को शूटिंग रेंज के साथ साथ जिंदगी से भी कदम कदम पर संघर्ष करना पडा़। सुर्खियों और ग्‍लैमर से दूर दोनों मोर्चों पर गुमनाम रह कर तेजस्विनी संघर्ष करती रही और आज दुनिया उनकी सफलता की चमक देख रही है।

दरअसल तेजस्विनी की मां सुनीता क्रिकेट की खिलाड़ी रही है। इसलिए वह अच्‍छे से जानती है कि मुसीबत के छक्‍के छुडाने के पहले उसकी चुनौती का सामना संयम से किया जाता है। मां से मिली सीख और कभी न हार मानने के जज्‍बे ने तेजस्विनी को भी मजबूत बना दिया। पिता की मौत का गम हो या फिर आर्थिक दिक्‍कतें तेजस्विनी ने कई बार खेल से तौबा करने का मन बना लिया। ऐसे मुश्किल वक्‍त में सुनीता मजबूती से खड़ी रही। तेजस्विनी की सफलता की और बढ़ाए हर कदम पर मां का साया साथ नजर आएगा। अब जब तेजस्विनी वर्ल्‍ड चैपिंयनशिप जीत गई तो वह गर्व से कह सकती है कि उसके पास मां है।


देश में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण दिए जाने की मांग हो रही है। पुरूषों के समान उन्‍हें अधिकार देने की बात कही जा रही है। इन सारे राजीनितिक झमेले के बीच सायना नेहवाल, तेजस्विनी सांवत जैसी खिलाडी है जिन्‍होंने अपने बलबूते पर सारी मुश्किलों को दूर कर सफलता हासिल की है। उन्‍हें न तो विरासत में कुछ मिला और नहीं शार्ट कट से वह दुनिया के मंच पर सबसे उपर खड़ी है। वे मिसाल बन रही है उभरते भारत की जो दुनिया को बता रही है कि हम किसी से कम नहीं।

Sunday, August 8, 2010

ये कौन चित्रकार है

वेंगीपुराप्‍पु वेंकटा साई लक्ष्‍मण अंग्रेजी वर्णमाला के 27 अक्षरों को प्रयोग कर यह नाम बना है। यह नाम जितना स्‍पेशल और लंबा है उतना ही स्‍पेशल और उपलब्धियों की लंबी फेहरिस्‍त वाला वह शख्‍स है जिसे इस नाम से जाना जाता है। क्रिकेट प्रेमी उसे बजाए इस नाम के वीवीएस लक्ष्‍मण यानि की वेरी वेरी स्‍पेशल लक्ष्‍मण के नाम से पहचानते है। लक्ष्‍मण एक बार फिर टीम इंडिया के लिए वेरी वेरी स्‍पेशल साबित हुए है। विपरीत परिस्थितियों में जमाए उनके शतक की बदौलत धोनी की सेना लंका की धरती पर शिकस्‍त खाने से बच गई।

वीवीएस लक्ष्‍मण को यूं तो हमेशा 281 रनों की पारी के लिए याद किया जाता है। कोलकाता में आस्‍ट्रेलिया के खिलाफ फॉलोआन खेलते हुए लक्ष्‍मण ने यह पारी खेली थी। यह पारी अब तक किसी भी भारतीय बल्‍लेबाज द्वारा खेली गई सबसे बेहतरीन पारी मानी जाती है। हालांकि लक्ष्‍मण ने कई बार ऐसी यादगार पारियां खेली है। कोलंबो टेस्‍ट की चौथी पारी में जमाया उनका शतक इसी कड़ी में शुमार होने वाली एक ओर पारी है।

विदेशी धरती पर लक्ष्‍मण ने खूब रन बनाए लेकिन उन्‍हें सबसे ज्‍यादा रास आस्‍ट्रेलियाई गेंदबाज ही आए। आस्‍ट्रेलियाई गेंदबाजों के खिलाफ उन्‍होंने जी भर कर रन बटोरें। इसके बावजूद उनकी क्षमताओं और का‍बिलियत को हमेशा कम करके आंका गया। दरअसल वह जिस दौर में भारतीय टीम का हिस्‍सा बने वह दौर सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड का दौर रहा। इसके बाद सौरव गांगुली और फिर एम एस धोनी की लोकप्रियता की वजह से यह स्टाइलिश बल्‍लेबाज वह सम्‍मान नहीं पा सका जिसका वह हकदार है। उन्‍हें हर बार अपनी काबिलियत साबित करनी पड़ी। टीम इंडिया को नंबर एक का ताज दिलाने में उनका भी अहम योगदान रहा लेकिन वह टीम में अनसंग हीरो की तरह ही रहे।


एक पर एक फ्री की तरह भारतीय टीम में शामिल होने के साथ ही एक अरब लोगों की उम्‍मीदों का बोझ भी फ्री में आप के कंधों पर आ जाता है। ऐसे में यदि सचिन, द्रविड और सहवाग जैसे दिग्‍गज पैवेलियन लौट जाए तो विरोधी टीम के गेंदबाज गेंद की बजाए तोप से गोले बरसाते नजर आते है। लक्ष्‍मण ऐसे हालात में विपक्षी टीम के सामने अंगद के पांव की तरह जम जाते है। जैसे आंच में तपकर सोना कुंदन बनता है वैसे ही दबाव की तपिश में लक्ष्‍मण को खेल निखरता है। विरोधी टीम जितना हावी होती है उतना ही लक्ष्‍मण का खेल परवान चढ़ता जाता है। लक्ष्‍मण को भी मानो बहाव के विपरीत कश्‍ती चलाने में ही ज्‍यादा मजा आता है।


वीवीएस लक्ष्‍मण की कलात्‍मक बल्‍लेबाजी को देखना अपने आप में एक यादगार अनुभव है। कोई चित्रकार जैसे किसी तस्‍वीर को बनाता है उसी तरह वीवीएस की पारी संजी संवरी रहती है। वह जब बल्‍लेबाजी करते है तो बल्‍ला चित्रकार की कूची और मैदान कैनवास सा नजर आता है। चित्रकार जैसे कही बेहद हल्के स्‍ट्रोक्‍स का इस्‍तेमाल अपनी कलाकृति में करता है कुछ उसी तरह लक्ष्‍मण का बल्‍ला स्पिन गेंदबाज के खिलाफ करीने से लेट कट या ऑन ड्राईव लगाता नजर आता है। चित्रकार कही तीखे चटक रंग के इस्‍तेमाल से कलाकृति को चार चांद लगाता है तो उसी तरह तेज गेंदबाजों के खिलाफ बेधड़क जमाए लक्ष्‍मण के पुल शॉटस उनकी बल्‍लेबाजी को नयी उंचाईयों पर ले जाते है।

तीन साल पहले सौरव गांगुली की विदाई के बाद गोल्‍डन फैब फोर में अगला निशाना वीवीएस लक्ष्‍मण को माना जा रहा था। 2008 में धोनी के नेतृत्‍व में युवाओं को मौका देने की बात जोर पकडने लगी थी। लक्ष्‍मण की जगह युवराज की पैरवी की जा रही थी। लक्ष्‍मण ने विचलित हुए बगैर अपना स्‍वाभाविक खेल जारी रखा। तीन साल बाद भी लक्ष्‍मण टीम के मुख्‍य आधार स्‍तंभ और जीत के शिल्‍पकार बने हुए है। वहीं युवराज 12वें खिलाड़ी है।


वीवीएस लक्ष्‍मण अपने माता पिता की तरह डाक्‍टर बनना चाहते थे। इसके लिए उन्‍होंने डाक्‍टरी की पढाई भी शुरू कर दी। 17 साल की उम्र में लक्ष्‍मण धर्मसंकट में फंस गए थे। उन्‍हें डाक्‍टरी की पढ़ाई या क्रिकेट दोनों में से एक को चुनना था। लक्ष्‍मण ने स्‍टेथस्‍कोप थामने की बजाए बल्‍ला थामने का फैसला लिया। लक्ष्‍मण के शब्‍दों में मैंने बतौर क्रिकेटर खुद को साबित करने के लिए पांच साल की समय सीमा तय की। यदि मैं राष्‍ट्रीय टीम में जगह बनाने में कामयाब नहीं होता तो डाक्‍टर बन जाता। वीवीएस ने जो लक्ष्‍मण रेखा तय की थी उसके खत्‍म होने तक वह दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टेस्‍ट मैच में पदार्पण कर चुके थे। हालांकि यह बात भी उतनी ही सच है कि जितना धैर्य, समर्पण, नज़ाकत और आत्‍मविश्‍वास लक्ष्‍मण में है यदि वह डाक्‍टरी पेशे में भी होते तो वहां भी खूब नाम और सम्‍मान कमाते।

Monday, August 2, 2010

बुलेटप्रूफ



भारतीय सैन्‍यबल इस वक्‍त अस्‍सी हजार से ज्‍यादा बुलेटप्रूफ जैकेट की कमी से जुझ रहे है। सरकार की ओर से बकायदा संसद में आधिकारिक तौर पर यह जानकारी दी गई है। मुंबई आतंकी हमले के वक्‍त भी सुरक्षाबलों के पास मौजूद बुलेटप्रूफ जैकेट की कमजोरियां सामने आई थी। देश पर हुए सबसे बड़े आतंकी हमले के बाद से ही बुलेटप्रूफ जैकेट को लेकर चिंताए बढ़ती जा रही है। बुलेटप्रूफ जैकेट को ले‍कर चिंता स्‍वाभाविक भी है लेकिन टीम इ‍ंडिया के लिए फिक्र की कोई बात नहीं है। टीम इंडिया के पास सचिन तेंदुलकर के रूप में एक ऐसा बुलेटप्रूफ जैकेट है जो 21 साल से हर मुसीबत का बखूबी सामना करता आया है।




मेड इन मुंबई सचिन तेंदुलकर भारतीय टीम के लिए संकटमोचक है। टीम जब भी मुसीबत में होती है तो साथी खिलाड़ी ही नहीं एक अरब से ज्‍यादा लोगों की उम्‍मीदें केवल और केवल सचिन पर टिकी होती है। श्रीलंका दौरे पर भी सचिन ही टीम इंडिया के लिए सुरक्षा कवच साबित हो रहे है। गॉल टेस्‍ट में वह शतक से चूके लेकिन टीम इंडिया को पारी की हार से वह बचाकर ले गए थे। मलिंगा, मेंडिस और मुरलीधरन के एम फेक्टर के हर तीर की धार सचिन के बल्‍ले से टकरा कर कुंद होती गई। कोलंबो में जब भारतीय टीम श्रीलंका के विशालकाय स्‍कोर के सामने मुश्किल में फंस गई उस वक्‍त सचिन ने ही टीम को मुसीबत के भंवर से सुरक्षित बाहर निकाला। अजीमों शान शहंशाह ने अपने टेस्‍ट कैरियर का पांचवा दोहरा शतक जमाया। क्रिकेट के सरताज ने अपनी पारी से टीम इंडिया के नंबर वन के ताज को बचा लिया।



37 साल के सचिन तेंदुलकर इन दिनों एक विज्ञापन में नजर आ रहे है। इस विज्ञापन की थीम है जो अंदर से है सॉलिड वही फेवरेट है। सचिन के जिंदगी का फलसफा भी कुछ ऐसा ही है। कोलंबो में दोहरा शतक जमाकर उन्‍होंने बता दिया कि उम्र के साथ साथ वह दिन ब दिन सॉलिड होते जा रहे है। जहां त‍क बात उनको फेवरेट मानने वालों की है तो वह सूची सेंसेक्‍स की तरह उपर नीचे नहीं होती रहती। वह तो महंगाई डायन जैसी है जो बस तेजी से बढ़ती ही जा रही है। ट्विटर पर थोड़े ही समय में प्रशंसकों के मामले में वह शाहरूख खान और प्रियंका चोपड़ा के करीब पहुंच चुके है। यह माइक्रो ब्‍लागिंग वेबसाइट उनकी लोकप्रियता का एक छोटा नमूना भर है।



चिन की खासियत है कि आलोचकों के फेंके पत्‍थरों को वह हथियार बनाकर हमला करने में विश्‍वास नहीं करते। वह इन पत्‍थरों को माइल स्‍टोन में बदल देते है। दरअसल सचिन सचिन है उनके जैसा दूजा नहीं। एक अरब से ज्‍यादा आबादी वाले इस मुल्‍क में वह एकमात्र ऐसे शख्‍स है जो एक साथ सबके चेहरे पर खुशियां ला सकते है। यही वजह है कि जब सचिन को चोट लगती है तो पूरा देश उस दर्द को महसूस करता है। सचिन यदि शतक के नजदीक होतो क्रिकेट प्रेमी उनसे ज्‍यादा तनाव महसूस करता है। पिछले 21 साल से वह हर क्रिकेट प्रेमी के दिल में धड़क रहे है।



याद कीजिए 26 नवंबर 2008 की वह काली रात। मुंबई को समंदर के रास्‍ते आए आतंकियों ने दहला दिया था। भारत में वन डे श्रृंखला में बुरी तरह शिकस्‍त खा चुकी इंग्‍लैंड टीम हमले के बाद दौरा छोड़कर स्‍वदेश लौट गई थी। हालात सुधरने के बाद इंग्‍लैंड टीम वापस भारत लौटी और चेन्‍नई में पहले ही टेस्‍ट में जीत की दहलीज पर पहुंच गई। 387 रनों के लक्ष्‍य का पीछा करते हुए सचिन ने ऐतिहासिक शतक लगाया और भारत को एक अविश्‍वसनीय जीत दिला दी। सचिन के शतक ने बिखरे बिखरे नजर आ रहे देश को फिर से जोड़ दिया। सचिन की इस पारी ने मुंबई हादसे के बाद जिंदगी को फिर से पटरी लाने में अहम रोल अदा किया।




सचिन उन सैनिकों के दिल में भी बसते है जिन्‍होंने सरहद हो या आतंरिक सुरक्षा हमेशा अपनी जान हथेली पर रखकर देश की एकता और अखंडता को सुरक्षित रखा है। शून्‍य से कई डिग्री नीचे तापमान में हो या फिर रेगिस्‍तान के मुश्किल हालात भारतीय सैनिकों ने हर मोर्चा जीता है। इन सैनिकों में लता मंगेशकर के सुरों की तरह सचिन के बल्‍ले से निकले रन जोश भर देते है। उम्‍मीद की जाना चाहिए की देश के सैनिकों को भी सचिन तेंदुलकर जैसा मजबूत बुलेटप्रूफ जैकेट मिलेगा जो लंबे समय तक बगैर चूके उनकी जिंदगी की सुरक्षा करता रहेगा।

Saturday, July 24, 2010

एम बोले तो मुरलीधरन

मैं कर सकता हूं नहीं यह मेरा घमंड नहीं विश्‍वास है। विश्‍वास और घमंड में बहुत  कम फर्क है। मैं कर सकता हूं, यह मेरा विश्‍वास है। सिर्फ मैं ही कर सकता हूं यह मेरा घमंड है।
गजनी फिल्‍म के हैविवेट सुपररिच मालिक संजय सिंघानिया का यह डॉयलाग श्रीलंका के जादुई गेंदबाज मुथैया मुरलीधरन पर सौ फीसदी खरा उतरा है। 18 साल का लंबा टेस्‍ट कैरियर 800 विकेट की बुलंदियों को केवल इसी थीम पर छू पाया कि मैं कर सकता हूं यह मेरा विश्‍वास है। आत्‍मविश्‍वास, चुनौतियों से निपटना, खुद के सामने बडा लक्ष्‍य रख उसे हासिल करना और टीम भावना जैसे शब्‍दों से जादुई ऑफ स्पिनर मुथैया मुरलीधरन के कैरियर का खाका खींचा जा सकता है। उनका खेल कैरियर मनोबल बढाने वाली किताब को पढने जैसा है।


बिस्किट बनाने वाले परिवार में जन्‍में मुरलीधरन कभी यह मुकाम पाएंगे किसी ने ख्‍वाब में भी नहीं सोचा होगा। मुरली को बचपन से ही यह अच्‍छे से मालूम था कि बिस्किट तभी कुरकुरा और स्‍वादिष्‍ट तैयार होता है जब वह भट्टी की तेज आंच में तपकर निकलें। बॉलिंग एक्‍शन और शुरूआती असफलताओं के बाद आलोचकों की भट्टी में उनकी खूब सिकाई हुई। आलोचनाओं की आंच से डरे बगैर मुरली की गेंदबाजी निखरती गई।  बालिंग एक्‍शन पर सवाल उठाकर उनके कैरियर को खत्‍म करने की कोशिश भी की गई। मुरलीधरन हर चुनौती से अपनी चिर परिचित मुस्‍कान के साथ विजेता की तरह निकले। 18 साल बाद जब मुरलीधरन ने टेस्‍ट क्रिकेट को विदा कहां तो वह उस मुकाम पर खडे है जहां कोई भी गेंदबाज पहुंच नहीं पाया है।


मुरलीधरन के पास 800 विकेट के शिखर को छूने के लिए भारत के खिलाफ तीन टेस्‍ट मैचों की श्रृंखला थी। दुनिया के इस सर्वश्रेष्‍ठ गेंदबाज ने केवल एक टेस्‍ट के बाद संन्‍यास का ऐलान कर सबको चौंका दिया था, क्‍योंकि उन्‍हें खुद पर विश्‍वास था कि वह एक ही टेस्‍ट में आठ विकेट लेने का माद्दा रखते है। वह भी दुनिया की सर्वेश्रेष्‍ठ बैटिंग लाइन के खिलाफ जिसमें मास्‍टर ब्‍लास्‍टर सचिन तेंदुलकर, द वॉल राहुल द्रविड, नजफगढ का सुल्‍तान वीरेन्‍द्र सहवाग और वेरी वेरी स्‍पेशल लक्ष्‍मण हो। मुरलीधरन ने अपने पूरे कैरियर में खुद के सामने मुश्किल लक्ष्‍य रखे है और उन्‍हें हासिल करने का जज्‍बां भी दिखाया है। यही वजह है कि इस ग्रह पर 800 टेस्‍ट विकेट लेने वाले वह पहले मानव बन गए।


मुरलीधरन केवल श्रीलंका में नहीं भारत में भी खासे लोकप्रिय है। दोनों मुल्‍कों के बीच रिश्‍तें त्रेता युग से रहे है। 20 वीं शताब्‍दी में रेडियो सिलोन और फिर लिट्टे के खिलाफ भारतीय शांति सेना के अभियान ने दोनों देशों को फिर जोडा। राजीव गांधी की हत्‍या के बाद श्रीलंकाई तमिलों के खिलाफ नाराजगी भी हुई, लेकिन 21 वी सदी में श्रीलंकाई तमिल खिलाडी मुथैया मुरलीधरन भारत में सबसे चहेते विदेशी क्रिकेटर हो गए। चेन्‍नई सुपर किंग्‍स के लिए खेलने वाले इस खिलाडी ने रेडियो सिलोन जैसी ही लोकप्रियता भारत में हासिल की। यही वजह है कि भारतीय क्रिकेट प्रेमी चाहते थे कि मुरली 800 विकेट हासिल करें लेकिन ख्‍वाहिश बस इतनी सी थी कि टेस्‍ट में भारत को हार का मुंह न देखना पडे।


दुनिया में सबसे ज्‍यादा टेस्ट और वन डे रन बनाने वाले मास्‍टर ब्‍लास्‍टर सचिन तेंदुलकर की तरह मुरलीधरन भी तेज गेंदबाज बनना चाहते थे। सचिन ने गेंद छोड़ बल्‍ला थामा तो मुरलीधरन ने गति को छोड़कर फिरकी को अपनाया। दोनों का यह निर्णय रिकार्ड बुक के वजन को बढाने वाला सा‍बित हुआ। खास बात यह है कि मुरली का इंटरनेशनल कैरियर में आगाज धमाकेदार नहीं हुआ था। इसके बाद भी मुरली ने हिम्‍मत नहीं हारी। कड़ी मेहनत और लड़ाकू क्षमता की बदौलत वह बरसों से श्रीलंका टीम के आधारस्‍तंभ बने रहें। मुरली केवल एक अच्‍छे क्रिकेटर नहीं बल्कि इंसान भी है। सुनामी ने जब श्रीलंका को बर्बाद कर दिया था उस वक्‍त उन्‍होंने सुनामी पीडितों के पुनर्वास में खासा काम किया था। श्रीलंकाई क्रिकेट प्रेमी मुरली को उसी तरह से पूजता है जिस तरह भारत में सचिन तेंदुलकर को भगवान माना जाता है। 


क्रिकेट की दुनिया में अब तक की सबसे यादगार विदाई मुरलीधरन की ही रही है। डॉन ब्रैडमेन अपनी आखरी पारी में चार रन बनाने से चूक गए थे तो लिटिल मास्‍टर सुनील गावस्‍कर भी आखरी पारी में चार रनों से शतक से चूक गए थे। मुरली इन सबसे परे अपने टेस्‍ट कैरियर की आखरी गेंद पर न केवल विकेट लेने में कामयाब रहे बल्कि उन्‍होंने अपनी टीम को जीत दिलाने में भी अहम रोल अदा किया। कहां ये जाता है कि खेल और खिलाडी के मुकाबले में अंत में जीत खेल की ही होती है लेकिन जुझारू मुरलीधरन ने जब संन्‍यास लिया तो न तो क्रिकेट जीता और नहीं खिलाडी हारा। बल्कि मुकाबला बराबरी पर रहा।

विदाई या आधुनिक भाषा में कहे फेयरवेल। एक ऐसा मौका होता है जब विदा होते व्‍यक्ति की स्‍मृतियों में ताउम्र ताजा रहे ऐसा गिफ्ट दिया जाता है। मुरली ने यह तोहफा 800 विकेट के रूप में खुद ही चुन लिया। इसके साथ ही भारत के खिलाफ जीत हासिल कर उन्‍होंने उल्‍टा अपनी टीम को रिटर्न गिफ्ट ही दिया। हर दिल अजीज और टीम में सबसे लोकप्रिय मुरलीधरन की कमी श्रीलंकाई क्रिकेट को हर वक्‍त खलेगी। मुरली जैसे खिलाडी सदियों में जन्‍म लेते है। मुरली जैसा कोई नहीं। अलविदा मुरली।

Monday, July 19, 2010

टेस्‍ट ऑफ हैदराबादी

भारतीय इतिहास में 17 मार्च की तारीख का कोई खास महत्‍व नहीं रहा है। इतिहास के जानकारों के लिए भी यह तारीख कोई खास मायने नहीं रखती, लेकिन यह तारीख पडोसी मुल्‍क और दुनिया की नयी आर्थिक महाशक्ति बनकर अमेरिका को चुनौती दे रहा चीन कभी भूल नहीं सकता है। तिब्‍बत में 1959 में मार्च की 17 तारीख को ही चीनी शासन के खिलाफ विद्रोह की चिंगारी उठी थी। इसी दिन दलाई लामा ल्‍हासा छोडकर भारत की सरजमी पर पहुंचे थे। 21 वी सदी में भी चीनी चुनौती को 17 मार्च की तारीख करारा जवाब दे रही है। यह चुनौती आर्थिक, सामरिक या राजनीतिक मोर्चे पर नहीं है बल्कि उस मोर्चे पर है जिस पर अब तक चीन का एकछत्र राज रहा है। यह मोर्चा है बैडमिंटन कोर्ट का जहां दुनिया की कोई भी ताकत उसके दबदबे को खत्‍म नहीं कर पाई है। चीन की दीवार को पहली बार जबर्दस्‍त सेंधमारी की है 17 मार्च को जन्‍मी साइना नेहवाल ने। चीनी रूतबे को पूरी तरह से तोडने से यह हैदराबादी बाला महज एक कदम दूर है।


बिरयानी के लिए मशहूर हैदराबादी खाना बेहद लजीज होता है। कुछ ऐसा ही लाजवाब खेल है 20 साल की साइना नेहवाल का। दुनिया में भारतीय खाने को मशहूर करने में लजीज हैदराबादी व्‍यंजन अहम रहे है, जबकि दुनिया में सबसे ज्‍यादा चाइनीज फूड खाया जाता है। टेस्‍ट ऑफ हैदराबादी ने इन दिनों चीनियों के मुहं का स्‍वाद बिगाडा हुआ है। हैदराबादी डिश जितनी नफासत से बनाई जाती है उतने ही करीने से साइना नेहवाल के खेल को सजा संवरा हुआ है। मंद आंच पर पकाए स्‍वादिष्‍ट भोजन की तरह साइना ने भी सफलता का स्‍वाद कदम दर कदम लेकिन मजबूत बुनियाद पर खडे होकर चखा है। 


हैदराबाद दक्षिण भारत का सबसे बडे शहरों में शुमार है। ग्रेटर हैदराबाद को मंजूरी मिलने के बाद तो यह दिल्‍ली के बाद क्षेत्रफल के लिहाज से देश का दूसरा सबसे बडा शहर बन गया है। पचास लाख से ज्‍यादा आबादी वाले शहर का साइना भी 12 साल पहले हिस्‍सा बन गई थी।  लाखों लोगों की भीड में खोने की बजाए साइना यहां अपनी अलग पहचान बनाने आई थी। यह शहर 15 वीं शताब्‍दी के आसपास अस्तित्‍व में आया था उस वक्‍त इसकी पहचान भाग्‍य नगर के रूप में थी। साइना के लिए भी यह शहर भाग्‍य नगर साबित हुआ। वैज्ञानिक पिता के साथ आठ साल की उम्र में हरियाणा के हिसार से हैदराबाद आई साइना की इस शहर ने पूरी जिंदगी ही बदल गई। इस उम्र में जब बच्चियां घर घर खेलती है, साइना 25 किलोमीटर का सफर केवल बैडमिंटन एकेडमी तक पहुंचने के लिए करती थी। वह 24 घंटे के दिन का कभी भी न खत्‍म होने वाला दौर था। इसी प्रेक्टिस की वजह है कि आज सफलता अर्जित करने का दौर भी कभी न रूकने वाला साबित हो रहा है।



बीस साल की साइना शाहरूख खान की जबर्दस्‍त फैन है। शाहरूख का बॉलीवुड का सफर और साइना की जिंदगी का सफर लगभग साथ साथ ही शुरू हुआ है। दोनों ने ही मेहनत और खुद पर आत्‍मविश्‍वास के दम में सफलता हासिल की। हालांकि साइना को अपने पसंदीदा हीरो की तरह हारकर जीतने वाला बाजीगर वाला तमगा पसंद नहीं है। वह जब कोर्ट में होती है तो जीत ही उसका एकमेव लक्ष्‍य होता है। आक्रमक खेल खेलकर वह विरोधी पर हावी हो जाती है। विरोधी समझ पाता इसके पहले साइना अपनी चिर परिचित मुस्‍कान लिए मैच जीतकर हैंड शेक करने नेट पर पहुंच जाती है। यदि विरोधी टक्‍कर दे फिर भी दमखम से वह शिकस्‍त देने का माद्दा रखती है।


खेल प्रेमी उनसे ओलम्पिक और वर्ल्‍ड चैम्पियनशिप में मेडल सहित उम्‍मीदों की लंबी फेहरिस्‍त लिए हुए है। इन सबके बीच खेल प्रेमी का ध्‍यान साइना के खातें में दर्ज एक बडी उपलब्धि पर नहीं जाता। आईपीएल में साइना को डेक्‍कन चार्जेस की टीम ने अपना ब्रांड एम्‍बेसेडर बनाया। दूसरी टीमों ने कैटरीना कैफ, शिल्‍पा शेट्टी, दीपिका पादुकोण जैसी हसीन बॉलीवुड तारिकाओं को यह जवाबदारी सौपी थी, लेकिन वेरी वेरी स्‍पेशल लक्ष्‍मण वाली टीम का चेहरा यह बैंडमिंटन खिलाडी बनी। क्रिकेट को धर्म और बॉलीवुड अदाकारा को अपना सब कुछ मानने वाले इस देश में साइना के लिए इससे बडी उपलब्धि और क्‍या हो सकती है। 



पूरे देश में मॉनसून सक्रिय है और साइना ने आसमां से बरस रही नेमत के बीच दुनिया में नंबर दो की पोजीशन हासिल की है। साइना का खेल भी बारिश की रिमझिम फुहारों सा है जिसका पानी जमीन में रिसकर धरती की आत्‍मा को तृप्‍त करता है। बारिश के साथ हर किसी के जीवन की सुखद यादे जुडी होती है, उम्‍मीद की जाना चाहिए की साइना के जीवन में यह मॉनसून उपलब्‍धियों की बारिश करें। आमीन।

Wednesday, July 14, 2010

द अलकेमिस्‍ट

ब्राजील के जाने माने लेखक पाओलो कोएले की मशूहर कृति है द अलकेमिस्‍ट। इस उपन्‍यास का मुख्‍य किरदार है स्‍पेन के दूरस्‍थ अंचल का गडरिया सेंटियागो है। यह एक ऐसे गड‍रिये की कहानी है जो मुश्किलों को फुटबॉल की तरह ठोकर मारकर दुनिया फतह करने निकला है। द अलकेमिस्‍ट के सेंटियागो की कहानी परी कथा सी लगती है। कहानी होने के बावजूद वह जिंदगी के करीब होते हुए असली सी लगती है। सेंटियागो के मुल्‍क स्‍पेन की वर्ल्‍ड कप फुटबॉल में सफलता भी इस गडरिये से मिलती जुलती है। स्‍पेन की टीम उस घमासान में विजयी हुई है जिस पर छह अरब लोगों की निगाहें लगी हुई थी और 214 मुल्‍क इसे पाने की होड में शामिल थे। आकंडों की कुछ ऐसी जादूगरी द अलकेमिस्‍ट के साथ भी जुडी है। 55 भाषाओं में किताब का अनुवाद किया । 150 से ज्‍यादा देशों में इस किताब ने बिक्री के नये रिकार्ड रचे और गिनीज बुक ऑफ वर्ल्‍ड रिकार्ड में जगह पाई।


स्‍पेन की वर्ल्‍ड कप यात्रा भी द अलकेमिस्‍ट को पढने और इस किताब के वर्ल्‍ड रिकॉर्ड बनाने की यात्रा जैसे ही है। यह किताब 1988 में पहली बार पुर्तगाली भाषा में सामने आई थी। इसी के बाद धीरे धीरे यह किताब पूरी दुनिया पर छा गई थी। सेंटियागो के दुनिया में सामने आने के 22 साल बाद स्‍पेन ने ठोकर से दुनिया को फतह की उसकी कडी भी पुतर्गाल से जुडती थी। पडोसी मुल्‍क के‍ खिलाफ प्री क्‍वार्टर फायनल में 1-0 से मिली जीत के बाद ही स्‍पेन को खिताब के दावेदारों में शुमार किया गया। सेंटियागो की तरह इस वर्ल्‍ड कप में स्‍पेन ने तमाम विपरीत हालात होने के बावजूद हौंसला नहीं खोया। यह टीम एक एक कर सारी बाधाओं दूर करती चली गई। बिलकुल ही कुछ ऐसा जैसे द अलकेमिस्‍ट के हाथ में आने के बाद सारी बाधाओं को दूर कर उसे एक बार में ही पूरा पढ डालने का मन करता है। यह यूरोपीयन टीम शुरूआती झटके के बाद यह टीम खिताब की दौड में टॉप गियर में दौडने लगी थी।

द अलकेमिस्‍ट में पाओलो कोएले लिखते है कि हमें अपने दिमाग से नकारात्मक विचारों की सफाई करते रहना चाहिए। स्‍पेन ने भी वर्ल्‍ड कप में भी यही किया। स्विट्जरलैंड के खिलाफ वर्ल्‍ड कप के अपने पहले ही मुकाबले में स्‍पेन को हार का मुंह देखना पडा था। स्‍पेन की हार को वर्ल्‍ड कप का सबसे बडा उलेटफेर बताया गया। इसके साथ ही फुटबॉल के स्‍वयंभू जानकारों ने वर्ल्‍ड कप से स्‍पेन की छुट्टी लगभग तय कर दी थी। स्‍पेनिश टीम ने ऐसे मोड पर हार के नकारात्‍मक विचारों को पीछे छोड जोरदार तरीके से वापसी की। पहले होंडूरास को शिकस्‍त देकर उम्‍मीदें कायम की और फिर चिली की चुनौती को एक जोरदार मुकाबले में शिकस्‍त देकर इस टीम ने नॉक आउट दौर में अपनी जगह बनाई थी।

सेंटियागो के माध्‍यम से किताब यह संदेश भी देती है जब तकदीर हमारा साथ दे रही हो तो हमें उसका फायदा उठाना चाहिए। हमें भी उसकी उतनी ही मदद करनी चाहिए , जितनी वह हमारी कर रहा है। स्‍पेन की खिताबी जीत में भी इसी संदेश के पीछे छुपी हुई है। इस वर्ल्‍ड कप में पांच बार की चैंपियन ब्राजील और अर्जेंटीना को खिताब का सशक्‍त दावेदार माना जा रहा था। माइकल बलाक की गैरमौजूदगी के बावजूद पहले मुका‍बले में धमाकेदार खेल के बाद जर्मनी की चुनौती को भी गंभीरता से लिया जा रहा था। इन सबके बीच यूरो कप चैंपियन स्‍पेन का दावा थोडा कमजोर नजर आ रहा था। स्‍पेन पर किस्‍मत की ऐसी मेहरबानी रही कि इन तीनों टीमें उसके आडे आए बगैर ही घर लौट गई। वर्ल्‍ड कप 2010 की चैंपियन इस टीम ने तकदीर की मेहरबानी में अपनी मेहनत जोडकर वह कर दिखाया जो अब तक वर्ल्‍ड कप फुटबॉल के इतिहास में नहीं हुआ।

यह वर्ल्‍ड कप मैसी, काका, रोनाल्‍डो और रूनी जैसे बडे खिलाडियों की चमक के साथ शुरू हुआ था। इनकी चकाचौंध के आगे बाकी किसी खिलाडियों पर खेल प्रेमी की न तो निगाहें थी और नहीं उम्‍मीदें जुडी हुई थी। स्‍पेन के खिलाडियों में डेविड विला ही खेल प्रेमियों की फेवरेट लिस्‍ट में शामिल था। बाकी खिलाडियों को बडे बडे दिग्‍गजों की मौजूदगी के चलते नजरअंदाज कर दिया गया था। यहां द अलकेमिस्‍ट के सेंटियागो की बात फिर की जाए तो पता चलता है कि उसकी खुशी का राज़ यह है कि दुनिया की तमाम चमकती चीजों को देखें ज़रूर , लेकिन अपने पास मौजूद चीजों को न भूलें। स्‍पेन भी इन नामी खिलाडियों की चकाचौंध में अपने उम्‍मीद के दिए को जलाए रखा। बजाए दुश्‍मन की ताकत से डरने से अपने हथियारों की धार को यह टीम पैना करती गई। जैसे जैसे द अलकेमिस्‍ट एक मुल्‍क से दूसरे मुल्‍क पहुंची उसकी लोकप्रियता उतनी ही तेजी से बढती गई। स्‍पेन का विजयी रथ भी पुतर्गाल से आगे बढा उसके साथ ही खिताब की दावेदारों में इस टीम का ग्राफ बढता ही गया।

80 साल से स्‍पेन के खिताब का सूखा खत्‍म हुआ तो अंत में भी सेंटियागो की तरह ही रहा। उपन्‍यास के अंत में सेंटियागो को अपने कदमों तले खजाना मिलता है। स्‍पेन को भी जोहांसबर्ग के सॉकर सिटी में पांव से ही सोना हासिल हुआ। आंद्रेस इनिस्ता के लेफ्ट फुटर ने 116 मिनिट में स्‍पेन के इस ख्‍वाब को सच कर दिया जो हर चार साल में टूट कर बिखर जाता था। 13 वर्ल्‍ड कप में शामिल होने के बाद स्‍पेनिश खिलाडी वर्ल्‍ड कप की ट्राफी को चूमने में कामयाब रहे। सेंटियागो पूरी दुनिया का चहेता है और वर्ल्‍ड कप चैंपियन बनने के बाद स्‍पेन भी।

Thursday, July 8, 2010

मैं नहीं हूं ना

मैं हूं ना फिल्‍म के हीरो शाहरूख खान के पास हर मर्ज की दवा होती है। फिल्‍म के हीरोइन की जान बचाना हो या फिर सुष्मिता सेन को इजहार ए मोहब्‍बत करना हो या फिर गुल हुई बत्‍ती की खामी को दूर करना हो। मैं हूं ना कहते हुए शाहरूख खान उस मास्‍टर चाबी की तरह हर जगह पर मौजूद रहते है जो मुसीबतों के ताले को खोल राह को आसान करती है। पिछले तीन वर्ल्ड कप से फ्रांस के लिए शाहरूख खान की भूमिका जिनेदिन जिडान निभा रहे थे। टीम की जरूरत के मुताबिक जिदान हर पोजीशन पर नजर आते थे। टीम की हर छोटी बडी दिक्‍कतों को यह जादूगर चुटकी में सुलझा देता था। फुटबॉल की भाषा में इस मैं हूं ना वाली भूमिका को प्‍ले मेकर कहां जाता है। वर्ल्‍ड कप में गत उपविजेता फ्रांस को प्‍ले मेकर ही भूमिका खली थी जो टीम को एक सूत्र में बांधकर रख सके और हर मुसीबत के वक्‍त कह सके कि मैं हूं ना।

मुख्‍य अभिनेता की गैरमौजूदगी की वजह से सहायक अभिनेताओं के भरोसे अफ्रीका पहुंची फ्रांस की टीम को फुटबॉल के बाक्‍स ऑफिस पर पहले से ही कमजोर आंका जा रहा था। कुछ नयी कुछ पुरानी रील को जोडकर तैयार की गई फिल्‍म की तरह इस टीम में जोडतोड साफ तौर नजर आ रही थी। यही वजह है कि इस टीम में एकजुटता और जीत के जस्‍बें का अभाव साफ झलक रहा था। इस पर कलाकारों के खुद को दूसरे से बेहतर साबित करने की होड मची हो और कमजोर एडिटिंग होतो फिल्‍म में बिखराव नजर आता है, कुछ ऐसा ही बिखराव व्‍यक्तिगत खेल खेलने की वजह से फ्रांस की टीम में भी नजर आ रहा था।

दरअसल, किसी भी फिल्‍म के लिए अब पहले तीन दिन बेहद महत्‍वपूर्ण होते है। आजकल इन तीन दिनों में फिल्‍म हाउसफुल हुई की उसे हिट मान लिया जाता है। फ्रांस की टीम वर्ल्‍ड कप के बॉक्‍स ऑफिस पर ओपनिंग होते ही दम तोड दिया। उरूग्‍वे के खिलाफ फर्स्‍ट डे फर्स्‍ट शो ने ही इस टीम पर फ्लॉप का ठप्‍पा लगा दिया था। पहले दिन जिस फिल्‍म ने पानी नहीं मांगा उसके दूसरे सप्‍ताह में प्रवेश करने की उम्‍मीद करना भी बेमानी माना जाता है। बावजूद इसके वितरकों को शनिवार और रविवार को वीक एंड पर फिल्‍म के रिवाइवल की उम्‍मीद बंधी रहती है वैसी ही उम्‍मीद बाकी दो मुकाबलों में गत उपविजेता टीम के समर्थकों को थी। फ्रांसीसी कलाकारों की लचर अदाकारी की वजह से फिल्‍म पिट गई और दूसरे दौर के पहले ही मार्केट से बाहर हो गई।

बडे बैनर कभी फिल्‍म की सफलता का पैमाना नहीं होता। बडा बैनर और नये कलाकार कई बार फ्लॉप फिल्‍म का फार्मूला बन जाते है। कुछ ऐसा ही फ्रांसीसी टीम के साथ हुआ। आपसी विवाद और विवादास्‍पद तरीके से आयरलैंड के खिलाफ प्‍ले ऑफ मुका‍बले में थियरे हेनरी के हेंडगोल यानि की हाथ से किए गोल की वजह से अंतिम दौर में फ्रांस की टीम वर्ल्‍ड कप का टिकिट कटा पाई थी। वितरक नहीं मिलने की वजह से जिस तरह फिल्‍म रिलीज होने में देरी हो जाती है उसी तरह फ्रांस की टीम ने किसी तरह गिरते पडते वर्ल्‍ड कप के क्‍वालिफाई किया था। फिल्‍म को रिलीज के लिए अंतिम समय तक संघर्ष करना पडे उससे सफलता की उम्‍मीद भी क्‍या की जा सकती है।

बाक्‍स ऑफिस पर जब कोई फिल्‍म रिलीज होती है तो सफलता का पैमान जीरो से शुरू होता है। पुरानी सफल असफल‍ फिल्‍मों का खाता जीरो हो जाता है। फिल्‍मों की तरह फुटबॉल में भी इतिहास का सेविंग अकाउंट काम नहीं आता है। मैं हूं ना वाले शाहरूख खान जब डॉन बने तो 11 मुल्‍कों की पुलिस को उनका नहीं बल्कि उन्‍हें दर्शकों का इंतजार करना पडा। पिछले तीन वर्ल्‍ड कप में फ्रांस ने एक बार खिताब पर कब्‍जा जमाया था तो पिछली बार वह खिताब से एक कदम दूर रह गया था, लेकिन दक्षिण अफ्रीका में यह गौरवशाली इतिहास किसी काम नहीं आया। फुटबॉल के सुपरहिट मुकाबले में यह टीम सुपर फ्लाप हुई क्‍योंकि मैं नहीं हूं ना।